भोपाल में घरेलू एलपीजी सिलेंडरों की सप्लाई से जुड़ा हालिया मामला केवल एक प्रशासनिक गड़बड़ी नहीं, बल्कि आम उपभोक्ताओं के भरोसे और आवश्यक सेवाओं की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। जिस समय लोग गैस सिलेंडर की कमी से जूझ रहे थे और समय पर रिफिल के लिए परेशान हो रहे थे, उसी दौरान सप्लाई व्यवस्था में कथित अनियमितताओं का सामने आना चिंता का विषय है।
भौरी के बकानिया स्थित इंडेन डिपो से गैस एजेंसियों तक सिलेंडर पहुंचाने वाले एक ट्रक की जांच में कई गंभीर तथ्य सामने आए हैं। नियमों के अनुसार हर गैस ट्रक में जीपीएस ट्रैकिंग अनिवार्य होती है, ताकि उसकी आवाजाही पर लगातार नजर रखी जा सके। लेकिन जांच में पता चला कि संबंधित ट्रक कई दिनों तक बिना जीपीएस निगरानी के संचालित होता रहा। इससे यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि निगरानी तंत्र आखिर काम कैसे कर रहा था।
मामले को और गंभीर बनाता है 342 सिलेंडरों की खेप में 27 सिलेंडरों का कम गैस वाला पाया जाना और पांच सिलेंडरों का बिना सील के मिलना। यह केवल तकनीकी त्रुटि नहीं मानी जा सकती। यदि उपभोक्ताओं तक कम गैस वाले सिलेंडर पहुंचते हैं, तो यह सीधे तौर पर उनके आर्थिक हितों से जुड़ा मामला है। उपभोक्ता पूरी कीमत चुकाता है, इसलिए उसे पूरी मात्रा में गैस मिलना उसका अधिकार है।
सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि मात्र 25 किलोमीटर की दूरी तय करने में ट्रक को लगभग 13 घंटे लग गए। चालक के स्पष्टीकरण और जांच में सामने आए तथ्यों के बीच कई सवाल अनुत्तरित हैं। यदि ट्रक रास्ते में रुका था, तो उसकी निगरानी क्यों नहीं हुई? यदि जीपीएस हटाया गया था, तो इसकी जानकारी संबंधित अधिकारियों को क्यों नहीं मिली?
इस पूरे मामले ने सप्लाई व्यवस्था में जवाबदेही और निगरानी दोनों की कमजोरियों को उजागर किया है। आवश्यक सेवाओं में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए केवल जांच और तबादले पर्याप्त नहीं हैं। जरूरत इस बात की है कि तकनीकी निगरानी को मजबूत किया जाए, दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई हो और उपभोक्ताओं का विश्वास बहाल किया जाए। क्योंकि गैस सिलेंडर केवल एक उत्पाद नहीं, बल्कि करोड़ों परिवारों की दैनिक जरूरत से जुड़ी सेवा है।


