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    जब गुरु की डांट का जवाब चाकू से मिले, तो कटघरे में सिर्फ बच्चे नहीं, पूरा समाज है

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    -महेश दीक्षित

    तेलंगाना के नलगोंडा से सामने आई स्कूल प्रिंसिपल कल्लू रूपा रेड्डी की हत्या की कहानी पढक़र मन विचलित हो जाता है। एक शिक्षक, जो बच्चों के भविष्य को संवारने और उनके चरित्र को गढऩे की जिम्मेदारी उठाता है, उसी की कथित हत्या का आरोप 10वीं कक्षा के दो छात्रों पर है। आरोप है कि पैसे और आलीशान जिंदगी की चाहत में उन्होंने अपनी प्रिंसिपल की हत्या की साजिश रची।

    रूपा रेड्डी के शरीर पर चाकू के 27 वार किए गए। यह सिर्फ एक महिला की हत्या नहीं है, बल्कि हमारी संवेदनाओं पर 27 वार हैं। यह सवाल हमारे सामने खड़ा है कि आखिर वह कौन-सी मानसिकता है, जो एक बच्चे के हाथ में कलम की जगह चाकू थमा देती है?

    पुलिस के मुताबिक, दोनों छात्रों ने कई दिनों तक घर की रेकी की, पहचान छिपाने के लिए मंकी कैप और दस्ताने खरीदे और वारदात के बाद खून से सने कपड़े तक दफना दिए। इसके बाद वे गोवा चले गए। जांच में पुलिस को यह भी पता चला कि दोनों कथित तौर पर इंटरनेट पर जल्दी पैसा कमाने के तरीके तलाश रहे थे। यहां सबसे ज्यादा पीड़ा देने वाली बात यह है कि आरोपी कोई पेशेवर अपराधी नहीं, दसवीं कक्षा में पढऩे वाले बच्चे हैं।

    बच्चे…जिनके हाथों में किताबें होनी चाहिए थीं।
    जिनकी आंखों में सपने होने चाहिए थे।
    जिनके मन में शिक्षक के प्रति सम्मान होना चाहिए था।

    लेकिन उन हाथों पर कथित तौर पर खून के छींटे हैं और उन सपनों की जगह अपराध की अंधेरी दुनिया ने ले ली।

    पुलिस के अनुसार, कुछ समय पहले हॉस्टल में नकदी और मोबाइल मिलने के बाद रूपा रेड्डी ने उनके माता-पिता को इसकी जानकारी दी थी। इसके बाद दोनों छात्रों को हॉस्टल से हटाकर डे-स्कॉलर कर दिया गया। यदि यही नाराजगी हत्या की वजह बनी, तो सवाल यह है कि क्या बच्चों को अपनी गलती पर शर्म महसूस कराने के बजाय हम उन्हें अपनी गलती स्वीकार करना सिखा रहे हैं? और क्या माता-पिता अपने बच्चों से इतना संवाद करते हैं कि वे अपनी नाराजगी, तनाव और गलत संगत के बारे में खुलकर बात कर सकें?

    आज बच्चे मोबाइल की स्क्रीन पर दुनिया देख रहे हैं। सोशल मीडिया उन्हें कुछ सेकंड में शोहरत, पैसा और ग्लैमर के सपने दिखा रहा है। इंटरनेट पर अपराध, हिंसा और ‘जल्दी अमीर बनने’ की कहानियां भी आसानी से उपलब्ध हैं। ऐसे में परिवार और स्कूल की भूमिका पहले से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई है।

    लेकिन इस घटना का दोष केवल सोशल मीडिया पर डाल देना भी आसान रास्ता होगा। कटघरे में हम सब हैं।

    माता-पिता से सवाल है-क्या हमने बच्चों को समय दिया?
    स्कूलों से सवाल है-क्या हमने केवल परीक्षा के अंक देखे या बच्चों के मन को भी पढ़ा?
    समाज से सवाल है-क्या हमने सफलता को केवल पैसा और आलीशान जीवन मान लिया है?
    और खुद बच्चों से सवाल है-क्या हमने उन्हें यह समझाना बंद कर दिया है कि गलती की सजा जीवनभर का अपराध नहीं, बल्कि सुधार का अवसर होती है?

    शिक्षक की डांट कभी-कभी कठोर लग सकती है, लेकिन वही डांट कई बार जिंदगी को भटकने से बचाती है। गुरु का हाथ पकडक़र चलने वाला बच्चा अगर उसी हाथ को अपराध की ओर मोड़ दे, तो यह केवल उस बच्चे की हार नहीं है; यह हमारी परवरिश और हमारी सामाजिक व्यवस्था की भी हार है।

    आज जरूरत बच्चों को डराने की नहीं, उन्हें समझने की है। उन्हें महंगे स्कूल, महंगे मोबाइल और सुविधाएं देने से पहले संस्कार, संवेदना, संयम और संवाद देना होगा। क्योंकि बच्चा अचानक अपराधी नहीं बनता। उसके भीतर अपराध की जमीन धीरे-धीरे तैयार होती है-कभी उपेक्षा से, कभी गलत संगत से, कभी दिखावे की भूख से और कभी उस खालीपन से, जिसे परिवार समय देकर भर सकता था। रूपा रेड्डी अब वापस नहीं आएंगी। उनका परिवार इस दर्द के साथ जीवन बिताएगा। लेकिन उनकी मौत हमें एक मौका देती है—अपने बच्चों के भीतर झांकने का।

    आइए, आज हर माता-पिता अपने बच्चे से सिर्फ यह न पूछे कि स्कूल में कितने नंबर आए। यह भी पूछे कि तुम्हारे मन में क्या चल रहा है?

    कहीं कोई बच्चा भीतर से टूट तो नहीं रहा?
    कहीं वह गलत रास्ते पर तो नहीं जा रहा?
    कहीं वह सफलता का अर्थ केवल पैसा और दिखावा तो नहीं समझ रहा?

    क्योंकि बच्चे को अपराध से बचाने का सबसे मजबूत हथियार कानून नहीं, संस्कार और संवाद हैं। और अगर हम आज भी नहीं चेते, तो कल किसी और स्कूल की घंटी के बीच किसी और शिक्षक की हत्या हो सकती है। यह शिक्षक नहीं की नहीं संस्कारों की हत्या है। यह केवल रूपा रेड्डी की कहानी नहीं है। यह हमारे बच्चों के भविष्य के सामने खड़ा एक आईना है। सवाल बस इतना है कि क्या हम उस आईने में अपना चेहरा देखने का साहस करेंगे?

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