मध्य प्रदेश राज्य महिला आयोग में ऐसे-ऐसे मामले सामने आ रहे हैं, जो परिवारों केा निजी विवाद नहीं है, बल्कि समाज के बदलते स्वरूप और टूटते पारिवारिक मूल्यों के गंभीर संकेत हैं। जब दो नाबालिग बच्चे स्वयं अपने पिता के खिलाफ शिकायत लेकर आयोग पहुंचते हैं, तो यह किसी भी सभ्य समाज के लिए आत्ममंथन का विषय होना चाहिए।
बच्चों का आरोप है कि उनके पिता के विवाहेतर संबंधों के कारण घर का वातावरण वर्षों से तनावपूर्ण बना हुआ है। विरोध करने पर मां के साथ मारपीट होती है, बच्चे भी हिंसा का शिकार होते हैं और लगातार मानसिक प्रताडऩा के कारण उनकी मां अवसाद (डिप्रेशन) में चली गईं तथा आत्महत्या का प्रयास तक कर चुकी हैं। यह स्थिति बताती है कि घरेलू हिंसा केवल पति-पत्नी के बीच का मामला नहीं होती, बल्कि उसका सबसे गहरा असर बच्चों के मन और भविष्य पर पड़ता है।
भारतीय संस्कृति में परिवार को समाज की सबसे मजबूत इकाई माना गया है। विश्वास, सम्मान और संवाद ही किसी भी परिवार की नींव होते हैं। जब इनकी जगह हिंसा, अविश्वास और अपमान ले लेते हैं, तो सबसे पहले बचपन घायल होता है। ऐसे बच्चे न केवल भावनात्मक असुरक्षा के शिकार होते हैं, बल्कि उनके व्यक्तित्व और मानसिक स्वास्थ्य पर भी दीर्घकालिक प्रभाव पड़ सकता है।
यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि विवाहेतर संबंधों, घरेलू हिंसा और मानसिक उत्पीडऩ जैसे मामलों को केवल “पारिवारिक मामला” कहकर टालने की प्रवृत्ति समाप्त हो। यदि परिवार के भीतर संवाद संभव न हो, तो समय रहते कानूनी, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक सहायता लेना आवश्यक है।
राज्य महिला आयोग की भूमिका ऐसे मामलों में केवल शिकायत सुनने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि पीड़ित महिला और बच्चों को काउंसिलिंग, कानूनी सहायता तथा मनोवैज्ञानिक सहयोग उपलब्ध कराने की दिशा में भी प्रभावी कदम उठाए जाने चाहिए।
किसी भी समाज की मजबूती उसकी इमारतों या आर्थिक प्रगति से नहीं, बल्कि उसके परिवारों की स्थिरता और बच्चों के सुरक्षित बचपन से मापी जाती है। यदि बच्चे अपने माता-पिता के बीच न्याय की गुहार लगाने को मजबूर हो जाएं, तो यह केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए गंभीर चेतावनी है। अब समय आ गया है कि हम पारिवारिक जिम्मेदारियों, आपसी सम्मान और संवेदनशील संवाद को फिर से अपने सामाजिक जीवन का आधार बनाएं।


