धर्म क्या है? आस्था, करुणा, प्रेम, शांति और मनुष्य को बेहतर बनाने का मार्ग या फिर अपने विचारों को श्रेष्ठ साबित करने, दूसरों की भावनाओं को आहत करने और विरोधियों को चुनौती देने का माध्यम? सनातनियों के आराध्य भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण चरित्र चित्रण और व्याख्या को लेकर छिड़ा विवाद आज यही बुनियादी सवाल खड़ा कर रहा है।
बागेश्वर धाम के धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की टिप्पणियों पर दामोदर यादव का विरोध और उसके जवाब में सामने आ रही तीखी बयानबाजी केवल दो व्यक्तियों के बीच का विवाद नहीं है। यह उस धार्मिक वातावरण की तस्वीर भी है, जिसमें आस्था के नाम पर संवाद की जगह टकराव और विवेक की जगह भावनात्मक उन्माद लेता जा रहा है।
श्रीराम और श्रीकृष्ण भारतीय चेतना के दो ऐसे विराट प्रतीक हैं, जिनके जीवन, चरित्र और दर्शन में मनुष्य के लिए अनगिनत संदेश छिपे हैं। दोनों की तुलना करना, उनकी मुद्राओं अथवा जीवन प्रसंगों की व्याख्या करना अपने आप में अनुचित नहीं है, लेकिन ऐसी अभिव्यक्ति में संवेदनशीलता और शास्त्रीय समझ का होना जरूरी है। धर्म के मंच से कही गई बात का प्रभाव व्यापक होता है। इसलिए कथावाचकों की जिम्मेदारी भी सामान्य वक्ताओं से कहीं अधिक है।
दूसरी ओर, किसी टिप्पणी से असहमति का अर्थ यह नहीं कि विरोध की भाषा में मर्यादा ही समाप्त कर दी जाए। किसी के खिलाफ कार्रवाई की मांग करना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन आश्रम पर ताला लगाने और किसी का इलाज करने जैसी धमकियां किस तरह संविधान और सनातन की मर्यादा के अनुरूप हो सकती हैं? असहमति का जवाब असहमति और गलत का जवाब कानून से होना चाहिए।
सबसे बड़ा प्रश्न उन लोगों से भी है, जो स्वयं को सनातन धर्म का ध्वजवाहक बताते हैं। क्या धर्म का वास्तविक अनुभव केवल कथाएं सुनाने, मंच सजाने और अनुयायियों की भीड़ जुटाने से हो जाता है? धर्म तो अहंकार के विसर्जन, करुणा के विस्तार और आत्मबोध का नाम है।
भगवान श्रीकृष्ण ने लीलाओं से प्रेम-समता का संदेश दिया, तो श्रीराम जीवन मर्यादा के आदर्श हैं। फिर उनके नाम पर समाज में वैमनस्य क्यों?
धर्म का प्रचार करने से पहले धर्म को जीना जरूरी है। क्योंकि धर्म की पहचान ऊंचे मंच, बड़ी भीड़ और प्रभावशाली भाषणों से नहीं, बल्कि मनुष्य के आचरण से होती है। जो धर्म मनुष्य को जोड़ नहीं सकता, उसे अपने भीतर झांकने की जरूरत है। सनातन की प्रतिष्ठा विवाद से नहीं, उसके मूल्यों के आचरण से बढ़ेगी।


