मध्यप्रदेश में बिना टाइप अप्रूवल सर्टिफिकेट के 2440 बसों के पंजीयन का मामला केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि व्यवस्था की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करता है। परिवहन आयुक्त के पत्र से स्पष्ट हो चुका है कि 1 सितंबर 2025 से लागू केंद्रीय नियमों के बावजूद प्रदेश के विभिन्न परिवहन कार्यालयों में बड़े पैमाने पर नियमों की अनदेखी कर बसों का पंजीयन किया गया। यह स्थिति चिंताजनक है, क्योंकि परिवहन व्यवस्था सीधे तौर पर यात्री सुरक्षा से जुड़ी हुई है।
किसी भी वाहन के लिए टाइप अप्रूवल सर्टिफिकेट यह सुनिश्चित करता है कि उसकी बॉडी निर्धारित सुरक्षा मानकों के अनुरूप निर्मित हुई है। ऐसे में यदि हजारों बसों का पंजीयन आवश्यक प्रमाणन के बिना हुआ है तो यह केवल तकनीकी त्रुटि नहीं, बल्कि यात्रियों की सुरक्षा के साथ गंभीर समझौता माना जाना चाहिए। इस पूरे मामले में मध्यप्रदेश बस ऑनर्स एसोसिएशन का यह तर्क भी विचारणीय है कि आम बस मालिकों को नियमों की जटिल जानकारी नहीं होती। वे परिवहन विभाग की स्वीकृति और प्रक्रिया पर भरोसा करके वाहन खरीदते और पंजीयन कराते हैं। यदि संबंधित अधिकारी ही नियमों की अनदेखी करते हुए पंजीयन स्वीकृत कर दें, तो इसकी पूरी जिम्मेदारी बस संचालकों पर डालना न्यायसंगत नहीं होगा।
असल प्रश्न यह है कि जब नियम स्पष्ट रूप से लागू थे, तब परिवहन अधिकारियों ने ऐसे पंजीयन स्वीकार कैसे किए? यदि यह जानबूझकर किया गया है और इससे किसी को अनुचित लाभ पहुंचाया गया है, तो यह केवल विभागीय त्रुटि नहीं बल्कि संभावित भ्रष्टाचार का मामला भी बन सकता है। ऐसे मामलों में निष्पक्ष जांच कर दोषी अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करना आवश्यक है। हालांकि कार्रवाई के नाम पर केवल पंजीयन निरस्त कर देना समाधान नहीं है। इससे हजारों बस संचालकों, कर्मचारियों और यात्रियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। सरकार को ऐसा संतुलित रास्ता अपनाना चाहिए जिसमें सुरक्षा मानकों का पालन भी सुनिश्चित हो और निर्दोष हितधारकों को अनावश्यक नुकसान भी न उठाना पड़े।
लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में कानून का सम्मान तभी संभव है, जब नियमों का उल्लंघन करने वालों को जवाबदेह ठहराया जाए। यह मामला सरकार के लिए एक अवसर भी है कि वह परिवहन व्यवस्था में पारदर्शिता, जवाबदेही और सुरक्षा मानकों को और मजबूत बनाए। जनता को अब निष्पक्ष जांच और ठोस कार्रवाई का इंतजार है।


