Bhopal Civic Issues: भोपाल नगर निगम में संपत्ति कर के रिकॉर्ड से छेड़छाड़ का मामला प्रशासनिक व्यवस्था की पोल खोलने के लिए काफी है। वार्ड 69 के न्यू अशोक गार्डन स्थित एक आवासीय मकान को रिकॉर्ड में 150 बिस्तरों का अस्पताल दर्शा दिया गया। नतीजा यह हुआ कि करीब 11 हजार रुपये का सालाना टैक्स बढ़कर 1.25 लाख रुपये से अधिक हो गया। हैरानी यह कि यह बदलाव ऐसी यूजर आईडी से दर्ज हुआ, जिसे संपत्ति की श्रेणी बदलने का अधिकार ही नहीं था। शिकायत के बाद रिकॉर्ड सुधारा गया और संबंधित कर्मचारियों पर कार्रवाई के निर्देश दिए गए। लेकिन क्या इतनी कार्रवाई से व्यवस्था की खामियां दूर हो जाएंगी?
यह मामला किसी एक मकान के गलत कर निर्धारण तक सीमित नहीं है। असल सवाल यह है कि नगर निगम के डिजिटल सिस्टम में ऐसी गड़बड़ी हुई कैसे? यदि सीमित अधिकार वाली आईडी से संपत्ति का पूरा वर्गीकरण बदल सकता है, तो तकनीकी सुरक्षा व्यवस्था कितनी भरोसेमंद है? क्या यह केवल सॉफ्टवेयर की खामी थी, मानवीय चूक थी या नियमों को दरकिनार कर बदलाव किया गया? इन सवालों के जवाब जांच के बाद ही सामने आएंगे। मगर जांच का दायरा केवल संबंधित कर्मचारियों तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं होगा।
भोपाल नगर निगम की कार्यप्रणाली को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। सफाई व्यवस्था की बदहाली हो, डीजल खपत और भुगतान से जुड़ी कथित अनियमितताएं हों या आवारा कुत्तों की नसबंदी पर खर्च की निगरानी का मामला—हर बार जवाबदेही और पारदर्शिता की मांग उठती है। इन मामलों में आरोपों और प्रमाणित निष्कर्षों के बीच अंतर करना जरूरी है, लेकिन लगातार सामने आती शिकायतों की निष्पक्ष जांच भी उतनी ही आवश्यक है।
विडंबना यह है कि आम नागरिक से टैक्स वसूली में निगम की मशीनरी तत्पर रहती है, लेकिन अपनी व्यवस्था में गड़बड़ी सामने आने पर जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया अक्सर सवालों के घेरे में आ जाती है। नागरिक से छोटी-सी चूक का हिसाब मांगा जाता है, तो सरकारी तंत्र की बड़ी चूक का हिसाब कौन देगा?
नगर निगम प्रशासन को अब केवल निलंबन और सेवा समाप्ति के निर्देश जारी करने से आगे बढ़ना होगा। संपत्ति कर के रिकॉर्ड में हुए सभी बड़े संशोधनों का डिजिटल ऑडिट कराया जाए। यूजर आईडी के लॉगिन और बदलावों का ब्योरा जांचा जाए। यह भी देखा जाए कि कहीं दूसरी संपत्तियों की श्रेणी बदलकर गलत टैक्स तो नहीं लगाया गया। सफाई, डीजल और नसबंदी जैसी सेवाओं के खर्च की स्वतंत्र जांच कराकर उसके निष्कर्ष सार्वजनिक किए जाने चाहिए।
भ्रष्टाचार और भर्राशाही पर अंकुश केवल आदेशों से नहीं लगता। इसके लिए पारदर्शी व्यवस्था, नियमित निगरानी और दोष सिद्ध होने पर समयबद्ध कार्रवाई जरूरी है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि नगर निगम की जवाबदेही तय करने वाला कौन है? जब निगरानी करने वाली व्यवस्था ही सवालों के घेरे में हो, तब स्वतंत्र जांच और सार्वजनिक जवाबदेही ही भरोसा बहाल करने का रास्ता है। भोपाल के नागरिकों को आश्वासन नहीं, अपनी जमा की गई रकम और अपने शहर की व्यवस्था का स्पष्ट हिसाब चाहिए।


