महेश दीक्षित
आवासीय भवनों के व्यावसायिक उपयोग पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद भोपाल नगर निगम अचानक जिस तेजी से सक्रिय हुआ है, उससे सबसे बड़ा सवाल यही खड़ा होता है कि इतने सालों तक नगर निगम सो रहा था या उसकी आंखों के सामने नियमों का उल्लंघन होता रहा?
दो दिनों में 2298 नोटिस और अब तक कुल 3316 नोटिस। एक दिन में 1135 नोटिस जारी करने की रफ्तार निश्चित रूप से निगम की कार्रवाई की गंभीरता बताती है, लेकिन यह सवाल भी उतनी ही गंभीरता से पूछा जाना चाहिए कि जिन 62 हजार से ज्यादा संपत्तियों को अब रहवासी क्षेत्रों में व्यावसायिक उपयोग वाली प्रॉपर्टी के रूप में चिन्हित किया जा रहा है, वे अचानक तो नहीं बनीं। दुकानें, कार्यालय, गोदाम और अन्य व्यावसायिक गतिविधियां वर्षों से चल रही थीं। फिर निगम का अमला इतने लंबे समय तक कहां था?
सुप्रीम कोर्ट के आदेश और नाराजगी के बाद कार्रवाई जरूरी है। नियमों का पालन होना भी चाहिए। शहर का सुनियोजित विकास और आवासीय क्षेत्रों की मूल प्रकृति बचाना भी जरूरी है। लेकिन नियम लागू करने की जिम्मेदारी केवल आम नागरिक की नहीं, नगर निगम की भी है।
आज नरेला, हुजूर, गोविंदपुरा, मध्य, दक्षिण-पश्चिम और उत्तर विधानसभा क्षेत्रों में धड़ाधड़ नोटिस दिए जा रहे हैं। अवधपुरी, अयोध्या बायपास, गौतम नगर, अशोका गार्डन और लालघाटी जैसे इलाकों में छोटे-बड़े कारोबारियों में चिंता है। कई लोग अब दुकानें खाली कर कमर्शियल क्षेत्रों में जगह तलाशने लगे हैं। ऐसे में उन लोगों का क्या होगा जिन्होंने वर्षों की मेहनत और पूंजी लगाकर कारोबार खड़ा किया?
सबसे गंभीर आरोप नोटिस के नाम पर कथित वसूली का है। यदि ऐसी शिकायतें सामने आ रही हैं तो नगर निगम को इसकी निष्पक्ष जांच करानी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के आदेश की आड़ में किसी कर्मचारी या अधिकारी को मनमानी या अवैध वसूली की छूट नहीं दी जा सकती।
सवाल यह भी है कि अगर 62 हजार से ज्यादा संपत्तियां नियमों के विपरीत पाई जा रही हैं तो जवाबदेही केवल मकान मालिक और दुकानदार की क्यों? इतने वर्षों तक अनुमति, निरीक्षण और निगरानी की जिम्मेदारी किसकी थी?
नियमों का पालन हो, लेकिन कार्रवाई पारदर्शी, समान और मानवीय हो। निगम को पहले अपनी वर्षों पुरानी निष्क्रियता का हिसाब देना चाहिए और फिर शहरवासियों से नियमों का हिसाब मांगना चाहिए। आखिर निगम की नींद का खामियाजा आम आदमी क्यों भुगते?


