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    भोपाल की सांसों पर संकट: प्रदूषण रोकने के सरकारी इंतजाम बेअसर

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    Bhopal Air Pollution: राजधानी भोपाल की हवा में धूल और धुएं का बढ़ता जहर शहरवासियों की सेहत के लिए खतरे की घंटी है। पीएम10 का वार्षिक औसत 110 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर पहुंच चुका है, जबकि निर्धारित मानक 60 माइक्रोग्राम है। यानी प्रदूषण का स्तर तय सीमा से करीब 83 प्रतिशत अधिक है। एक साल में इसमें महज तीन प्रतिशत की कमी दर्ज होना प्रदूषण नियंत्रण के प्रयासों की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े करता है।

    शहर में एमपी नगर, कोलार, रेलवे स्टेशन, लालघाटी, करोंद और नादरा बस स्टैंड समेत 21 प्रदूषण हॉटस्पॉट चिह्नित किए गए हैं। इसके बावजूद धूल उड़ाती सड़कों, निर्माण स्थलों और अन्य प्रदूषण स्रोतों पर प्रभावी नियंत्रण कितना हुआ, इसका ठोस ब्योरा जरूरी है।

    नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) की केंद्रीय क्षेत्रीय पीठ ने संबंधित विभागों से दो सप्ताह में जवाब और पुराने आदेशों पर कार्रवाई की रिपोर्ट मांगी है। अगली सुनवाई 18 नवंबर को होगी। याचिकाकर्ता राशिद नूर खान की ओर से हर्षवर्धन तिवारी ने पक्ष रखा।

    पीएम10 के कण सांस के साथ शरीर में पहुंचकर खांसी, सांस लेने में परेशानी और अस्थमा की समस्या बढ़ा सकते हैं। लंबे समय तक प्रदूषित हवा के संपर्क में रहने से फेफड़ों और हृदय संबंधी बीमारियों का खतरा भी बढ़ सकता है। बच्चों, बुजुर्गों और पहले से बीमार लोगों पर इसका असर अधिक गंभीर हो सकता है।

    प्रदूषण कम करने के लिए ब्लोअर के बजाय सक्शन मशीनों से सड़कों की सफाई, फुटपाथ और सड़क किनारों को पक्का करने, खाली स्थानों पर पौधे लगाने, निर्माण स्थलों की निगरानी और खुले में कचरा जलाने पर रोक लगाने की सिफारिश की गई है। प्रदेश में 39 नए वायु गुणवत्ता निगरानी केंद्र खरीदने की प्रक्रिया भी जारी है। हालांकि, हॉटस्पॉट के लिए विभागवार जिम्मेदारी और समयसीमा तय होना बाकी है।

    जब प्रदूषण के हॉटस्पॉट चिह्नित हैं और नियंत्रण के उपाय भी सुझाए जा चुके हैं, तब सवाल केवल योजनाओं का नहीं, उनके जमीन पर उतरने का है। नगर निगम, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और संबंधित विभागों को नियमित कार्रवाई, सार्वजनिक निगरानी रिपोर्ट और लापरवाही पर दंडात्मक कदमों से अपनी जवाबदेही साबित करनी होगी। अन्यथा प्रदूषण नियंत्रण की योजनाएं कागजों तक सीमित रहेंगी और भोपालवासियों को स्वच्छ हवा के बजाय जहरीली धूल और धुएं में सांस लेने को मजबूर होना पड़ेगा।

     

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