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    अस्पतालों में जिंदगी की रखवाली कौन करेगा?

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    नवजातों की मौतें स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल

    अस्पताल वह जगह है, जहां इंसान अपनी जिंदगी बचाने की आखिरी उम्मीद लेकर पहुंचता है। खासकर नवजात शिशु गहन चिकित्सा कक्ष यानी NICU से परिवारों को उम्मीद होती है कि उनके बच्चे को हर खतरे से सुरक्षित रखा जाएगा। लेकिन जब अस्पताल के भीतर ही आग, लापरवाही या अव्यवस्था जिंदगी के लिए खतरा बन जाए तो सवाल केवल एक हादसे का नहीं रहता, बल्कि पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था की विश्वसनीयता पर उठता है।

    महाराष्ट्र के अमरावती जिला महिला अस्पताल के NICU में सोमवार तड़के आग लगने से तीन नवजातों की मौत ने इसी चिंता को फिर सामने ला दिया है। घटना के समय 39 नवजात भर्ती थे। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार वेंटिलेटर में धमाके के बाद आग और धुआं फैला। डॉक्टरों, नर्सों और कर्मचारियों ने तत्परता दिखाकर अधिकांश बच्चों को बाहर निकाला, लेकिन तीन मासूमों की जान नहीं बच सकी। छह नवजातों को सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल में शिफ्ट किया गया।

    यह अकेली घटना नहीं है। मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिला अस्पताल में भी शनिवार तड़के NICU में आग लगी थी। वहां वार्मर के फिलामेंट से निकली चिंगारी के बाद आग लगी और तीन नवजात झुलस गए। उस समय 33 बच्चे NICU में मौजूद थे और कर्मचारियों ने 30 बच्चों को सुरक्षित बाहर निकाला।

    इसके पहले इंदौर के एमवाय अस्पताल में बच्चों को चूहों द्वारा कुतरने की घटनाएं और छिंदवाड़ा में जहरीली सिरप से नवजातों की मौत जैसी घटनाएं भी स्वास्थ्य व्यवस्था की संवेदनशीलता पर सवाल खड़े कर चुकी हैं।

    इन घटनाओं को केवल ‘दुर्भाग्यपूर्ण हादसा’ कहकर आगे बढ़ जाना आसान है, लेकिन क्या यह पर्याप्त है? क्या NICU जैसे संवेदनशील वार्ड में उपकरणों की नियमित जांच, फायर सेफ्टी ऑडिट और आपातकालीन निकासी की व्यवस्था वास्तव में प्रभावी है?

    स्वास्थ्य सेवाओं पर सरकारें भारी भरकम बजट खर्च करती हैं। अस्पतालों में आधुनिक उपकरण लगाए जाते हैं, डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी नियुक्त किए जाते हैं। फिर भी यदि नवजातों की जान अस्पताल के भीतर ही असुरक्षित है तो व्यवस्था की प्राथमिकताओं पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

    यहां दोष तय करना जांच का विषय है, लेकिन जवाबदेही तय करना शासन की जिम्मेदारी है। स्वास्थ्य मंत्री से लेकर वरिष्ठ अधिकारियों और अस्पताल प्रशासन तक यह सुनिश्चित करना होगा कि हर NICU का नियमित सुरक्षा ऑडिट हो, उपकरणों की समय पर सर्विसिंग हो और कर्मचारियों को आपदा प्रबंधन का प्रशिक्षण मिले।

    जिन हाथों को जिंदगी बचाने की जिम्मेदारी सौंपी गई है, उन हाथों तक व्यवस्था की लापरवाही नहीं पहुंचनी चाहिए। नवजातों की मौत किसी आंकड़े का हिस्सा नहीं है—वे किसी परिवार की पूरी दुनिया होते हैं।

     

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