-महेश दीक्षित
Europe Youth Protests: युवा जब सड़कों पर उतरते हैं, तो इसे केवल कानून-व्यवस्था की समस्या मान लेना सत्ता की बड़ी भूल हो सकती है। उनके आक्रोश के पीछे अक्सर वे सवाल होते हैं, जिनका जवाब व्यवस्था लंबे समय से टालती आ रही होती है। यूरोप के छह देशों में शिक्षा, बेरोजगारी, महंगाई और आवास संकट के खिलाफ उठती आवाजें इसी असंतोष की ओर संकेत करती हैं। भारत के जेनजी आंदोलन को भी इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में समझने की जरूरत है।
फ्रांस, इटली, स्पेन, ग्रीस, बेल्जियम और अल्बानिया में युवाओं का गुस्सा अलग-अलग मुद्दों से उपजा है, लेकिन उसकी जड़ में भविष्य को लेकर असुरक्षा है। फ्रांस में शिक्षा व्यवस्था और महंगाई के खिलाफ प्रदर्शन हुए। इटली में जर्जर स्कूलों और शिक्षा पर कम सरकारी खर्च को लेकर छात्र आंदोलित हैं। ग्रीस में महंगे किराये और छात्रावासों की कमी ने विद्यार्थियों को संसद के सामने टेंट लगाने पर मजबूर किया है। स्पेन में आवास संकट के खिलाफ आवाज बुलंद हो रही है, जबकि बेल्जियम में शिक्षा बजट में कटौती और अल्बानिया में बेरोजगारी तथा भ्रष्टाचार के खिलाफ आक्रोश दिखाई दे रहा है।
इन आंदोलनों की तुलना भारत के जेनजी आंदोलन से करें तो एक समान चिंता सामने आती है-युवा केवल आश्वासन नहीं, अपने जीवन में ठोस बदलाव चाहते हैं। रोजगार के अवसर, सस्ती शिक्षा, रहने के लिए घर और योग्यता के अनुरूप भविष्य अब महज चुनावी वादे नहीं, सरकारों की जवाबदेही की कसौटी बनते जा रहे हैं।
भारत में भी बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं में देरी, पेपर लीक, महंगी शिक्षा और अवसरों की असमानता युवाओं की चिंताओं में शामिल हैं। डिजिटल माध्यमों ने उन्हें अपनी समस्याएं साझा करने और सामूहिक आवाज उठाने की ताकत दी है। हालांकि, भारत और यूरोप के आंदोलनों की परिस्थितियां अलग हैं। इसलिए दोनों को एक जैसा मानने के बजाय उनके पीछे मौजूद असंतोष को समझना अधिक जरूरी है।
विरोध का अर्थ हिंसा की छूट भी नहीं हो सकता। सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना, आगजनी और लूटपाट किसी जायज मांग को कमजोर करते हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण विरोध का सम्मान और हिंसा पर निष्पक्ष कार्रवाई, दोनों आवश्यक हैं।
असल सवाल यह है कि सरकारें युवाओं के आक्रोश को समय रहते सुनती क्यों नहीं हैं? शिक्षा और रोजगार पर पर्याप्त खर्च, पारदर्शी भर्ती, किफायती आवास तथा जवाबदेह प्रशासन जैसे कदम केवल घोषणाओं तक सीमित रहे तो असंतोष बढ़ सकता है।
युवाओं को उपद्रवी बताकर उनकी समस्याओं से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता। यूरोप का घटनाक्रम भारत के लिए भी एक सबक है। जिस पीढ़ी से देश और दुनिया का भविष्य संवारने की उम्मीद की जाती है, यदि वही अपने भविष्य को लेकर निराश हो जाए तो यह व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती है।
युवाओं की आवाज दबाने से असंतोष खत्म नहीं होता। उसका स्थायी समाधान तभी संभव है, जब उनकी समस्याओं को सुना जाए और वादों को जमीन पर उतारा जाए। यही किसी भी लोकतांत्रिक सरकार की जवाबदेही की असली कसौटी है।


