बिरसा ब्लॉक के जगला गांव पहुंचकर पीड़ित परिवारों से मिले कांग्रेस नेता
बालाघाट। Balaghat Children Deaths : बालाघाट में आदिवासी बच्चों की मौत का मामला अब राजनीतिक और प्रशासनिक बहस के केंद्र में आ गया है। कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी गुरुवार को जिले के बिरसा ब्लॉक के जगला गांव पहुंचे, जहां उन्होंने बीमारी और कुपोषण से जान गंवाने वाले बच्चों के परिजनों से मुलाकात कर उनकी पीड़ा सुनी। इस दौरान बड़ी संख्या में स्थानीय आदिवासी भी उनसे मिलने पहुंचे और अपनी समस्याएं बताईं।
राहुल गांधी ने प्रदेश की भाजपा सरकार पर आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराने में विफल रहने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि प्रभावित परिवारों को समय पर इलाज और जरूरी सरकारी सहायता मिलनी चाहिए थी। राहुल ने इस मामले को लोकसभा में उठाने की बात कहते हुए आदिवासी परिवारों की समस्याओं को राष्ट्रीय स्तर पर सामने लाने का संकेत दिया।
मौतों के आंकड़ों पर असमंजस
बालाघाट में बच्चों की मौत के मामले में प्रशासन और कांग्रेस की ओर से अलग-अलग आंकड़े सामने आए हैं। प्रशासनिक जानकारी के आधार पर कुछ रिपोर्टों में 32 बच्चों की मौत का उल्लेख किया गया है, जबकि अन्य रिपोर्टों में यह संख्या 34 बताई गई है। वहीं, कांग्रेस विधायक संजय उइके ने 43 बच्चों की मौत का दावा किया है। आंकड़ों में इस अंतर के चलते मौतों की वास्तविक संख्या और प्रत्येक मामले के कारणों को लेकर स्थिति स्पष्ट होना बाकी है।
स्वास्थ्य सुविधाओं और मुआवजे का मुद्दा
राहुल गांधी ने प्रभावित परिवारों को मुआवजा देने के साथ ही आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने वन अधिकार, मनरेगा, शिक्षा और रोजगार से जुड़े मुद्दे भी उठाए। उनका कहना था कि आदिवासी परिवारों को बुनियादी सुविधाओं और सरकारी योजनाओं का लाभ सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
दूसरी ओर, भाजपा नेताओं ने राहुल गांधी के दौरे को राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश करार दिया है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव पहले ही प्रभावित परिवारों को दो-दो लाख रुपये की आर्थिक सहायता देने की घोषणा कर चुके हैं।
हाईकोर्ट भी मांग चुका है रिकॉर्ड
बच्चों की मौत का मामला मध्यप्रदेश हाईकोर्ट तक पहुंच चुका है। हाईकोर्ट सरकार से इस संबंध में रिकॉर्ड मांग चुका है। अब प्रशासन के सामने मौतों के अंतिम आंकड़े स्पष्ट करने, प्रत्येक मामले में मृत्यु के कारणों की जांच करने और प्रभावित परिवारों को दी गई सहायता का ब्योरा सामने रखने की चुनौती है। इस पूरे मामले ने आदिवासी अंचलों में स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता, कुपोषण की स्थिति और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।


