भोपाल। फिल्म ‘हनुमान अंश’ को लेकर दर्शकों और प्रबुद्ध नागरिकों की प्रतिक्रियाएं सामने आने के बाद यह सवाल चर्चा में है कि क्या सिनेमा एक बार फिर समाज के खोते मूल्यों, मानवता और नैतिकता की बात करने लगा है? धार्मिक पृष्ठभूमि पर बनी इस फिल्म को कुछ दर्शक आस्था और विश्वास से जोड़कर देख रहे हैं तो कुछ इसके भीतर छिपे सामाजिक संदेश को ज्यादा महत्वपूर्ण मान रहे हैं।
‘सामाजिक मूल्यों की पुनर्स्थापना का प्रयास है फिल्म हनुमान अंश’ विषय पर हुई परिचर्चा में संयोजक अशोक मनवानी ने दर्शकों, लेखकों और कलाकारों की प्रतिक्रियाओं को सामने रखा।
‘फिल्म सिर्फ आस्था की नहीं, आत्मबोध की भी बात करती है’
फिल्म में “किसी से कभी आसक्ति न रखो” और “विषय नहीं, शोध का विषय है आत्मबोध” जैसे संवाद दर्शकों का ध्यान खींच रहे हैं। चर्चा में शामिल लोगों का मानना है कि इन संवादों के कारण फिल्म धार्मिक कथा से आगे बढ़कर व्यक्ति को अपने भीतर झांकने और जीवन के मूल्यों पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है।
‘बहेलिये वाला प्रसंग आज के समाज पर सीधा कटाक्ष’
दर्शकों को फिल्म के बहेलिये वाला प्रसंग भी खासा प्रभावित करता है। पशु-पक्षियों को फंसाने वाला बहेलिया यहां मानवीय प्रवृत्तियों का प्रतीक बनकर सामने आता है।
बाबा नीम करोली का सवाल “आज क्या फांस लिया?” दर्शकों को समाज में मौजूद स्वार्थ, छल और एक-दूसरे को अपने जाल में फंसाने की मानसिकता की याद दिलाता है। इसी तरह दूसरे के खेत से तरबूज चुराने और उसके दंडित होने का प्रसंग गलत आचरण के परिणाम को रेखांकित करता है।
शरद कुमार सोनी: ‘सिनेमा को फिर अपनी विश्वसनीयता हासिल करनी होगी’

टीवी एडिटर शरद कुमार सोनी, भोपाल ने कहा कि फिल्में लंबे समय से समाज का दर्पण और मार्गदर्शक रही हैं। लेकिन व्यावसायिकता बढ़ने के साथ सिनेमा समाज से दूर हुआ है।
उनके मुताबिक अब फिल्मों को अपनी विश्वसनीयता फिर हासिल करनी होगी। उन्होंने बाबा भारती और खड़ग सिंह की कहानी का उल्लेख करते हुए कहा कि मनुष्य की विश्वसनीयता और सामाजिक मूल्यों को बनाए रखना आज भी उतना ही जरूरी है।
सरिता बघेला: ‘हर हिट फिल्म की लोकप्रियता स्वाभाविक नहीं होती’

भोपाल की लेखिका सरिता बघेला ने फिल्म की लोकप्रियता के संदर्भ में सोशल मीडिया की भूमिका पर सवाल उठाया। उनका कहना है कि आज किसी फिल्म की चर्चा में स्वाभाविक दर्शक प्रतिक्रिया के साथ प्रायोजित प्रचार का असर भी हो सकता है।
उन्होंने कहा कि कई बार अच्छी फिल्में भी अपेक्षित सफलता नहीं पातीं। नाना पाटेकर अभिनीत ‘युगपुरुष’ इसका उदाहरण है।
जीपी चांदवानी: ‘सिनेमा बिखरते मूल्यों को फिर जोड़ सकता है’
स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त रंगकर्मी जी.पी. चाँदवानी ने ‘हनुमान अंश’ को धार्मिक फिल्मों की लोकप्रियता की नई लहर से जोड़ते हुए कहा कि जय संतोषी मां के दौर जैसी रुचि फिर दिखाई दे रही है।
उनके अनुसार फिल्म की सफलता यह बताती है कि सिनेमा में बिखरते सामाजिक मूल्यों को फिर जोड़ने और जागृति पैदा करने की ताकत है। उन्होंने सागर के सुनील लोधी के गाए गीत की लोकप्रियता का भी उल्लेख किया।
विनीता मोटलानी: ‘आस्था और विश्वास का संगम महसूस होता है’
इंदौर निवासी लेखिका विनीता मोटलानी ने कहा कि आस्था और विश्वास के संगम को महसूस करना हो तो ‘हनुमान अंश’ देखी जा सकती है। उनके अनुसार फिल्म नीम करोली बाबा के व्यक्तित्व और विचारों को समझने का अवसर देती है।
उनका कहना है कि हनुमान जी में आस्था रखने वाले दर्शकों के लिए फिल्म विश्वास को और मजबूत कर सकती है। उन्होंने अपनी प्रतिक्रिया “जय हनुमान, जय सीताराम” के साथ व्यक्त की।
दर्शकों की प्रतिक्रियाओं में दिखी अलग-अलग तस्वीर
‘हनुमान अंश’ को लेकर सामने आई प्रतिक्रियाओं में एक दिलचस्प बात यह है कि हर दर्शक फिल्म को अपने नजरिए से देख रहा है। किसी को इसमें आस्था और विश्वास दिखाई देता है, किसी को आत्मबोध, तो किसी को मानवता और सामाजिक नैतिकता का संदेश।
यही विविध प्रतिक्रियाएं फिल्म को चर्चा का विषय बना रही हैं। सवाल अब सिर्फ यह नहीं है कि फिल्म कितनी सफल है, बल्कि यह भी है कि क्या ऐसी फिल्में दर्शकों को कुछ सोचने और अपने सामाजिक व्यवहार पर सवाल उठाने के लिए प्रेरित कर रही हैं?
‘हनुमान अंश’ पर बहस यहीं खत्म नहीं होती
दर्शकों और प्रबुद्ध नागरिकों की प्रतिक्रियाओं से साफ है कि ‘हनुमान अंश’ को लेकर चर्चा केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है। फिल्म के बहाने विश्वास, नैतिकता, मानवता, परोपकार और सामाजिक मूल्यों पर भी बहस शुरू हुई है।
शायद यही किसी फिल्म की सबसे बड़ी उपलब्धि है—वह पर्दे पर कहानी खत्म होने के बाद भी दर्शकों के मन में सवाल छोड़ जाए।


