कार्यालय बना नहीं, जनसुनवाई का ठिकाना तय नहीं; जनता का सवाल-सांसदजी से मिलें तो मिलें कहां और कब?
-महेश दीक्षित
भोपाल। भोपाल की जनता ने जिस भरोसे के साथ आलोक शर्मा को अपना अमूल्य वोट देकर संसद भेजा, वही जनता इन दिनों अपने सांसद से मुलाकात को लेकर परेशान है। वजह यह कि किसी नागरिक को अपने क्षेत्र की समस्या लेकर सांसद से मिलना हो तो उसे यह पता नहीं रहता कि सांसदजी आखिर कब और कहां मिलेंगे।
आलोक शर्मा भाजपा के खांटी और पुराने नेताओं में गिने जाते हैं। वे भोपाल के महापौर भी रह चुके हैं और राजधानी की राजनीति में लंबे समय से सक्रिय हैं। ऐसे में उनसे जनता की सहज पहुंच और नियमित जनसुनवाई की अपेक्षा स्वाभाविक है। लेकिन आरोप है कि सांसद बनने के करीब दो साल बाद भी जनता के लिए उनसे मिलने की कोई स्पष्ट और स्थायी व्यवस्था नहीं बन सकी है।
सांसद से मिलना है तो पहले ‘खोज अभियान’ चलाइए!
भोपाल के नागरिकों के लिए सांसद से संपर्क का एक प्रमुख माध्यम मोबाइल नंबर 7049969598 भी है। यदि कोई नागरिक अपने क्षेत्र की समस्या लेकर सांसद से मिलना चाहता है तो वह इस नंबर पर संपर्क कर सकता है। फोन पर बात हो गई और मिलने का समय भी मिल गया तो इसके बाद अगली चुनौती सामने आती है-मुलाकात होगी कहां? यानी समस्या लेकर आने वाले नागरिक के लिए सांसद से मिलने की पहली सीढ़ी ही संपर्क साधना और उपलब्धता सुनिश्चित करना बन जाती है।
‘मुलाकात का ठिकाना’ भी सांसदजी की मर्जी से तय!
शहर के एक सम्मानित नागरिक ने नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर बताया कि मोबाइल पर बात होने के बाद सांसद से मिलने का स्थान भी सांसद की ओर से ही तय किया जाता है। हर नागरिक के लिए कोई एक स्थायी स्थान निर्धारित नहीं है। बताया गया कि कई बार मुलाकात के लिए अलग-अलग स्थान बताए जाते हैं। ऐसे में खासकर दूर से समस्या लेकर आने वाले लोगों को पहले यह पता करना पड़ता है कि सांसदजी आज किस ठिकाने पर उपलब्ध होंगे।
घर का पता पक्का, लेकिन सांसदजी कब मिलेंगे-इसका पता नहीं!
सांसद आलोक शर्मा का स्थायी पता 21, रामानंद कॉलोनी, पहाड़ी, नेवरी मंदिर रोड, लालघाटी, भोपाल बताया जाता है। लेकिन शिकायत यह है कि इस पते पर भी सांसद से मुलाकात का कोई नियमित समय तय नहीं है। नागरिक के लिए यह सुनिश्चित करना मुश्किल होता है कि सांसद घर पर कब उपलब्ध होंगे। सांसद कब घर से निकलेंगे और कब वापस लौटेंगे, यह उनके निजी कार्यक्रम पर निर्भर करता है।
दो साल में भी नहीं बना ‘जनता का दरबार’
आलोक शर्मा को सांसद निर्वाचित हुए करीब दो साल हो चुके हैं। इसके बावजूद भोपाल में जनता से नियमित संवाद के लिए स्थायी कार्यालय या तय जनसुनवाई व्यवस्था नहीं बन पाने पर सवाल उठ रहे हैं।
जनप्रतिनिधि का काम ही जनता की समस्याएं सुनना और उन्हें संबंधित मंच तक पहुंचाना है। ऐसे में यदि जनता को मिलने के लिए ही कोई स्पष्ट व्यवस्था न मिले तो सवाल स्वाभाविक है कि आम नागरिक अपनी समस्या लेकर आखिर जाए कहां?
कार्यालय के लिए बंगला नहीं
बताया जाता है कि आलोक शर्मा को सांसद निर्वाचित हुए दो साल होने के बावजूद भोपाल में सरकारी बंगला आवंटित नहीं हो सका है। इसके लिए उनकी ओर से कई आवेदन और निवेदन किए जाने की बात कही जाती है, लेकिन अब तक स्थायी कार्यालय की व्यवस्था नहीं बन पाई है।
वहीं, विधायकों को सरकारी आवास आवंटित किए जाते हैं। ऐसे में सवाल यह भी है कि सांसद के लिए नियमित जनसंपर्क कार्यालय की व्यवस्था कब होगी?
शिवराज दिल्ली गए पूछ-परख घट गई?
आलोक शर्मा पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान के करीबी नेताओं में गिने जाते रहे हैं। शिवराज के मुख्यमंत्री रहते भोपाल की राजनीति में आलोक शर्मा का अलग रसूख था। लेकिन शिवराज सिंह चौहान के दिल्ली जाने के बाद उनकी अपनी ही सरकार में पहले जैसी पूछ-परख नहीं रहने की चर्चाएं राजनीतिक गलियारों में होती रही हैं। आलोक शर्मा भी समय-समय पर सरकार में अपनी सुनवाई नहीं होने को लेकर नाराजगी जाहिर करते रहे हैं। स्थानीय जिला प्रशासन अधिकारियों द्वारा उनकी बात को अपेक्षित गंभीरता से नहीं लेने की चर्चाएं भी सामने आती रही हैं।
महापौर से सांसद बने, मगर जनता तक पहुंच का रास्ता क्यों कठिन?
आलोक शर्मा भोपाल के महापौर रह चुके हैं। नगर की राजनीति में उनकी लंबी सक्रियता रही है और वे भाजपा के संगठन में भी महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभा चुके हैं। ऐसे नेता से जनता के बीच लगातार संवाद की अपेक्षा स्वाभाविक है।सांसद बनने के बाद यदि जनता को मिलने के लिए मोबाइल से संपर्क, फिर समय और उसके बाद मुलाकात के स्थान का इंतजार करना पड़े, तो जनप्रतिनिधि और जनता के बीच संवाद की व्यवस्था पर सवाल उठना लाजिमी है।
जनता का सवाल-सांसद को ढूंढें या अपनी समस्या का समाधान?
सांसद किसी एक दल या वर्ग के नहीं, बल्कि पूरे संसदीय क्षेत्र के प्रतिनिधि होते हैं। इसलिए सवाल केवल आलोक शर्मा से मिलने का नहीं, बल्कि जनता और उसके चुने हुए प्रतिनिधि के बीच सहज संवाद की व्यवस्था का है। भोपाल की जनता का सवाल है-सांसदजी से मिलना है तो ठिकाना कौन-सा है, समय कौन-सा है और जनसुनवाई की स्थायी व्यवस्था आखिर कब बनेगी?


