-महेश दीक्षित
naradji kahin: मप्र में निगम, मंडल, प्राधिकरण, आयोग और अकादमियों में हो रही नियुक्तियों ने इन दिनों भाजपा के देवतुल्य कार्यकर्ताओं की बेचैनी बढ़ा रखी है। सवाल यह नहीं है कि नियुक्तियां हो रही हैं, सवाल यह है कि ये नियुक्तियां कौन कर रहा है और किसके इशारे पर हो रही हैं? कार्यकर्ताओं की पीड़ा यह है कि वे 25-30 साल से पार्टी की सेवा में जुटे रहे। उन्हें उम्मीद थी कि कभी तो निष्ठा और मेहनत का फल मिलेगा। लेकिन जब कुर्सियां बंटने की बारी आई तो सत्ता सुख की मलाई ‘अनजान चेहरे’ ले उड़े। अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और निदेशक जैसी महत्वपूर्ण कुर्सियों पर ऐसे भाईसाबों को विराजित कर दिया गया, जिन्हें न पार्टी में कोई जानता है और न जनता पहचानती है। अब देवतुल्य कार्यकर्ता पूछ रहे हैं कि, आखिर सत्ता और संगठन में वह कौन ‘मिस्टर इंडिया’ है, जो निष्ठावान कार्यकर्ताओं को किनारे कर सत्ता सुख की रेवडय़िां अनजान भाईसाबों में बांट रहा है?
मोहन कैबिनेट से छह मंत्रियों की छुट्टी तय!
मप्र के सियासी और प्रशासनिक गलियारों में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के लगातार दिल्ली दौरों के बीच मंत्रिमंडल विस्तार की चर्चाएं फिर तेज हो गई हैं। चर्चा है कि सितंबर के आखिरी सप्ताह में कैबिनेट विस्तार हो सकता है। इसके साथ ही छह मंत्रियों की छुट्टी और नए, खासकर युवा चेहरों को मौका दिए जाने की चर्चा है। सरकार और संगठन ने मंत्रियों के कामकाज का फीडबैक तैयार किया है। इसमें करीब छह मंत्रियों की कार्यशैली को लेकर सवाल उठे हैं। इन मंत्रियों की शिकायतें पार्टी के शीर्ष नेतृत्व तक भी पहुंची हैं। बताते हैं मुख्यमंत्री ने संभावित फेरबदल की सूची तैयार कर ली है और अब केंद्रीय नेतृत्व की मंजूरी का इंतजार है। नारदजी कहते हैं कि मंत्रिमंडल में फेरबदल की चर्चाओं ने सरकार के कई माननीयों की धडक़नें बढ़ा दी हैं। अब देखना दिलचस्प होगा कि दिल्ली दरबार से किसकी कुर्सी बचती है और किसकी जाती है!
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कृष्णा को मिली सीएम बनने की शुभकामनाएं!
यह सुनकर किसी को भी आश्चर्य हो सकता है… क्योंकि फिलहाल तो मप्र की कमान मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के हाथों में है। उन्हें हटाए जाने या उनके स्थान पर किसी और को बैठाए जाने के दूर-दूर तक कोई राजनीतिक संकेत भी नजर नहीं आ रहे हैं। लेकिन राजनीति में कब क्या हो जाए, कौन जाने! मामला कुछ यूं है कि मप्र सरकार में मंत्री कृष्णा गौर जब ओरछा में आयोजित भाजपा की प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में शामिल होने पहुंचीं, तो भाजपा की एक वरिष्ठ नेत्री और पूर्व मंत्री ने उनकी आत्मीय अगवानी की। स्वागत-सत्कार के साथ ही उन्होंने कृष्णा गौर को एडवांस में मप्र का भावी मुख्यमंत्री बनने की शुभकामनाएं भी दे डालीं। अचानक मिली इस ‘वीआईपी शुभकामना’ से कृष्णा गौर भी तनिक सकुचा गईं। नारदजी कहते हैं कि, राजनीति में शुभकामनाएं कभी बेवजह नहीं होतीं, लेकिन हर शुभकामना का मतलब भी तुरंत निकाल लेना ठीक नहीं। फिलहाल यह शुभकामना भले ही बेमतलब लगे, लेकिन भाजपा की राजनीति में कब क्या हो जाए, कहना मुश्किल है। सो, कृष्णा गौर को मिली यह ‘एडवांस बधाई’ भले ही अभी चर्चा और मुस्कुराहट का विषय हो, लेकिन राजनीति के गलियारों में इसे लेकर कान जरूर खड़े हो गए हैं। यह भाजपा है भैया… यहां कुछ भी हो सकता है!
चार ‘भाईसाबों’ की दायित्व मुक्ति चर्चाओंं में
भाजपा मुख्यालय में इन दिनों चार ‘भाईसाबों’ की दायित्व मुक्ति चर्चा का विषय बनी हुई है। वर्षों से किसी न किसी जिम्मेदारी के बहाने मुख्यालय में अंगद की तरह पांव जमाए बैठे इन भाईसाबों से कुछ अहम काम वापस ले लिए गए हैं। बताया जा रहा है कि इनमें से दो भाईसाब फिलहाल प्रदेश संगठन में किसी पद पर नहीं हैं। लेकिन इसके बावजूद भाजपा मुख्यालय में चेंबरों पर कब्जा जमाए बैठे थे। यह बताने के लिए मानो संगठन में उनके बिना पत्ता भी नहीं खडक़ता है। इसी तरह एक प्रमुख पदाधिकारी से कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां भी वापस ली गई हैं। पार्टी के भीतर उनकी कार्यशैली और ईमानदारी को लेकर उठ रहे सवालों के बीच पार्टी नेतृत्व ने यह कदम उठाया है। अब नारदजी तो प्रदेश नेतृत्व से यही कहेंगे-देर आयद, दुरुस्त आयद! संगठन में जिम्मेदारी वही, जो भरोसे के साथ निभे और पार्टी के हित में काम आए।
कप्तान साब की मजबूरी या आरोपी से जुगलबंदी!
बालाघाट के बहुचर्चित 1100 करोड़ रुपये के चावल घोटाले की चर्चा इन दिनों भोपाल से लेकर दिल्ली तक है। घोटाले की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, पुलिस कई आरोपियों को गिरफ्तार भी कर चुकी है। लेकिन चर्चा उस आरोपी की ज्यादा है, जिस पर पुलिस का शिकंजा अब तक नहीं कस सका है। मामला यहीं से रोचक हो जाता है। आरोप है कि घोटाले से जुड़ा यह प्रमुख आरोपी रसूखदार है। तथा पूर्व मंत्री व वर्तमान भाजपा जिला अध्यक्ष का ज्येष्ठ भ्राता है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर कप्तान साब के हाथ इस रसूखदार आरोपी के गिरेबां तक पहुंचने में इतनी हिचक क्यों दिखा रहे हैं? क्या कप्तान साब के हाथ किसी अदृश्य दबाव ने रोक रखे हैं? या फिर पर्दे के पीछे कोई जुगलबंदी हो चुकी है? नारदजी कहते हैं कि कानून की नजर में रसूख नहीं, सबूत मायने रखते हैं। यदि आरोपी के खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य हैं तो फिर कार्रवाई में देरी क्यों? और यदि साक्ष्य नहीं हैं तो जांच की स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं की जा रही? अर्थात कप्तान साब की चुप्पी जितनी लंबी होगी, सवाल उतने ही गहरे होते जाएंगे।


