महेश दीक्षित
भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के गठन के बाद अब मध्यप्रदेश में दतिया और विजयपुर उपचुनाव में मिली हार को लेकर सत्ता और संगठन की भूमिका की समीक्षा का दौर तेज हो गया है। दिल्ली में पार्टी हाईकमान ने इन दोनों चुनावी झटकों को गंभीरता से लिया है। दतिया में हार के अगले ही दिन नरोत्तम मिश्रा समर्थक मानी जाने वाली जिला भाजपा की पूरी कार्यकारिणी भंग कर दी गई। इसके बाद अब सियासी गलियारों में चर्चा तेज है कि मप्र भाजपा के सत्ता और संगठन में बदलाव को लेकर जल्द ही कुछ बड़े फैसले हो सकते हैं। सवाल यह है कि बदलाव सिर्फ संगठन तक सीमित रहेगा या इसकी आंच सत्ता तक भी पहुंचेगी? नारदजी कहते हैं कि दो उपचुनावों में मिली हार के बाद दिल्ली में जिस तरह की चिंता और हलचल दिखाई दे रही है, उससे इतना तो साफ है कि मध्यप्रदेश में सत्ता-संगठन के स्तर पर ‘कुछ तो’ होने वाला है। अब यह ‘कुछ’ छोटा होगा या बड़ा? बदलाव सिर्फ संगठन तक सीमित रहेगा या सत्ता तक भी पहुंचेगा? भाईसाब, ये भाजपा है… यहां कब और क्या बदल जाए, कोई नहीं जानता!
मामा के खुल्लम-खुल्ला समर्थकों में तीसरी एंट्री!
मामा जब तक मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे, तब तक न जाने कितनों को ‘उपकृत’ कर नेता बनाया। लेकिन उनके दिल्ली जाते ही इनमें से ज्यादातर ‘उपकृत’ न जाने कहां गायब हो गए। अब मामा के खुल्लम-खुल्ला समर्थकों में सिर्फ दो चेहरे नजर आते हैं, जो भोपाल-दिल्ली की आवाजाही के दौरान एयरपोर्ट पर मामा का वंदन-अभिनंदन करते दिखाई दे जाते हैं। इनमें से एक को मामा ने बीडीए उपाध्यक्ष की कुर्सी दिलाने के साथ ही सीहोर जिले में रेत खदान का इंतजाम कराया था। दूसरे को पहले राजगढ़ जिला युवा मोर्चा अध्यक्ष और फिर प्रदेश उपाध्यक्ष बनवाया। अब मामा के खुल्लम-खुल्ला समर्थकों की सूची में तीसरे नेताजी की भी एंट्री हो गई है। नेताजी मंडीदीप नगर पालिका अध्यक्ष के पति हैं। चर्चा है कि नेताजी की ‘पटवाजी’ से पटरी नहीं बैठ रही थी। ऊपर से आए दिन तरह-तरह की ‘डिमांड्स’ ने भी उनकी परेशानी बढ़ा रखी थी। नारदजी कहते हैं कि नेताजी को ‘मामा भक्ति’ से कुछ मिले न मिले, लेकिन ‘पटवाजी’ से मुक्ति जरूर मिल गई!
दतिया हारे, बसई जीते… नेताओं में श्रेय की होड़!
दतिया उपचुनाव का नतीजा भाजपा के पक्ष में भले ही नहीं गया हो, लेकिन बसई क्षेत्र में मिली बढ़त ने पार्टी के भीतर एक नई राजनीतिक प्रतियोगिता जरूर शुरू कर दी है। मुकाबला अब कांग्रेस से नहीं, बल्कि अपने-अपने ‘श्रेय’ को लेकर है। जिसने जितनी देर बसई की धूल फांकी, वह उतना ही बड़ा विजेता बनने की कोशिश में जुटा है। किसी का कहना है कि मामा की धुआंधार सभा ने कमाल कर दिया, तो उनके समर्थक पूरे दमखम से यह कथा सुना रहे हैं कि बसई में मिली बढ़त उसी जनसभा का प्रतिफल है। उमा दीदी की बसईवासियों के नाम लिखी भावुक चि_ी भी अब राजनीतिक उपलब्धि में तब्दील हो गई है। उनके समर्थकों का दावा है कि दीदी की अपील ने ऐसा असर दिखाया कि बसई ने भाजपा की झोली भर दी। भोपाल से दतिया पहुंचकर बसई में डेरा जमाने वाले कई छुटभैये नेता भी अपने-अपने हिसाब से विजय पताका फहरा रहे हैं। हर कोई बसई की बढ़त में अपनी भूमिका गिनाने में जुटा है। अब सवाल यह है कि जीत एक ही है और दावेदार इतने सारे, तो असली विजेता आखिर कौन? नारदजी कहते हैं कि राजनीति में श्रेय का गणित वोटों के गणित से भी ज्यादा पेचीदा होता है। दतिया की हार की कसक के बीच बसई की बढ़त को अपनी उपलब्धि बताने की असली वजह शायद इतनी ही है कि पार्टी हाईकमान की नजर में अपने नंबर बढ़ाए जा सकें।
‘बड़बोली तोपें’ भाजपा के लिए बनीं मुसीबत
भाजपा में इन दिनों दो ‘माननीय’ ऐसे हैं, जिनकी जुबान पार्टी के लिए ‘बड़बोली तोप’ बन गई है। तोप का काम दुश्मन पर निशाना साधना होता है, लेकिन यहां निशाना अपनी ही पार्टी पर साधा जा रहा है। गुना के पन्नालाल शाक्य और पिछोर के प्रीतम सिंह लोधी के बयान आए दिन भाजपा संगठन और सरकार को असहज स्थिति में डाल रहे हैं। पन्नालाल शाक्य ने रामायण और महाभारत का जिक्र करते हुए महिलाओं को लेकर ऐसा बयान दे दिया, जिस पर विवाद खड़ा हो गया। उधर, प्रीतम लोधी कह रहे हैं कि विरोधी डाक बंगले में उनके पास महिलाओं को भेजकर वीडियो बनवाते हैं और उन्हें दुष्कर्म के मामले में फंसाने की साजिश रचते हैं। उनके इस बयान ने भी पार्टी के लिए असहज स्थिति पैदा कर दी। पार्टी नेतृत्व दोनों ‘माननीयों’ को कई बार समझाइश दे चुका है, लेकिन इन ‘तोपों’ की फायरिंग रुकने का नाम नहीं ले रही। अब पार्टी के सामने दुविधा यह है कि कार्रवाई करे तो मुश्किल और न करे तो ये ‘बड़बोली तोपें’ हर दिन नई परेशानी खड़ी करती रहेंगी।
साहिबा के एनजीओ के लिए चल रही ‘साहबी’!
मप्र के एक साहब (आईएएस) इन दिनों अपनी ‘साहिबा’ को लेकर चर्चाओं में हैं। चर्चा है कि साहब को जिस जिले में कलेक्टरी का मौका मिलता है, वे प्रशासनिक जिम्मेदारियों के साथ-साथ अपनी साहिबा के एनजीओ की ‘सेवा’ में भी जुट जाते हैं। जनकल्याण के नाम पर जिले में आने वाले फंड का रुख भी येन-केन-प्रकारेण साहिबा के एनजीओ की ओर मोड़ देते हैं। हालांकि, साहब की इस ‘साहिबा सेवा’ और ‘समाजसेवा’ के बीच के समीकरणों को लेकर शिकायतें अब सीएम सचिवालय तक पहुंच चुकी हैं। ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि साहब की इस ‘साहिबा सेवा’ का कभी ऑडिट होता है या फिर मामला यूं ही फाइलों में दबा रह जाता है। नारदजी बताते हैं कि ये साहब महाकौशल के आदिवासी जिले बालाघाट में लंबे समय तक कलेक्टरी कर चुके हैं।


