नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक सेवा में प्रवेश के नियमों में बड़ा बदलाव किया है। अब निचली न्यायपालिका में जज बनने के लिए उम्मीदवारों को तीन साल की अनिवार्य वकालत के बजाय कम से कम एक साल की सक्रिय प्रैक्टिस करनी होगी। इसके साथ ही चयनित उम्मीदवारों के लिए नियुक्ति से पहले व्यापक प्रशिक्षण और क्लर्कशिप को अनिवार्य किया गया है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि न्यायिक सेवा परीक्षा में सफल उम्मीदवारों को सीधे नियुक्ति देने के बजाय उन्हें व्यावहारिक न्यायिक कार्य का पर्याप्त अनुभव और प्रशिक्षण दिया जाएगा।
एक साल की ट्रेनिंग और एक साल की क्लर्कशिप
नए प्रावधान के तहत न्यायिक सेवा परीक्षा में चयनित उम्मीदवारों को पहले राज्य न्यायिक अकादमी में एक साल का गहन प्रशिक्षण लेना होगा। इसके बाद छह महीने किसी जिला न्यायाधीश या उच्चतर न्यायिक सेवा के अधिकारी के साथ क्लर्कशिप करनी होगी।
इसके बाद छह महीने किसी मौजूदा हाईकोर्ट जज के साथ काम करना होगा। इस तरह उम्मीदवारों को अदालत की कार्यप्रणाली, केस मैनेजमेंट, आदेश-लेखन और न्यायिक प्रक्रिया का व्यावहारिक अनुभव मिलेगा।
31 मार्च 2027 तक संक्रमणकालीन राहत
सुप्रीम कोर्ट ने नए नियम लागू करने के दौरान उम्मीदवारों को राहत भी दी है। 31 मार्च 2027 तक संक्रमण अवधि में सभी कानून स्नातक न्यायिक सेवा परीक्षा के लिए आवेदन कर सकेंगे।
इस अवधि में उम्मीदवारों के लिए आवेदन के समय एक साल की सक्रिय वकालत का प्रमाणपत्र देना अनिवार्य नहीं होगा। यह व्यवस्था पुराने और नए नियमों के बीच संक्रमण को आसान बनाने के लिए की गई है।
तीन साल की प्रैक्टिस पर क्यों हुआ बदलाव?
सुप्रीम कोर्ट ने समीक्षा याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान माना कि तीन साल की अनिवार्य प्रैक्टिस से कानून की पढ़ाई पूरी करने वाले युवाओं के लिए न्यायिक सेवा में प्रवेश से पहले लंबा अंतराल बन सकता है। इससे प्रतिभाशाली उम्मीदवार न्यायिक सेवा को करियर के रूप में चुनने से पीछे हट सकते हैं।
अदालत ने माना कि वकालत का अनुभव जरूरी है, लेकिन इसके साथ यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि योग्य और प्रतिभाशाली कानून स्नातकों के लिए न्यायिक सेवा के रास्ते अनावश्यक रूप से कठिन न हों।
महिला उम्मीदवारों के मुद्दे पर भी चर्चा
सुनवाई के दौरान महिला उम्मीदवारों के सामने आने वाली व्यावहारिक चुनौतियों पर भी चर्चा हुई। परिवार, विवाह और स्थान परिवर्तन जैसी परिस्थितियों के कारण कुछ महिलाओं के लिए लंबे समय तक अनिवार्य वकालत पूरी करना मुश्किल हो सकता है। अदालत ने न्यायिक सेवा में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए नियमों को व्यावहारिक और संतुलित रखने की जरूरत पर जोर दिया।
2025 के फैसले की हुई समीक्षा
सुप्रीम कोर्ट ने मई 2025 में प्रवेश स्तर के न्यायिक पदों के लिए वकील के रूप में कम से कम तीन साल की प्रैक्टिस अनिवार्य की थी। इस फैसले के खिलाफ कई समीक्षा याचिकाएं दायर की गई थीं।
अब अदालत ने इस व्यवस्था में बदलाव करते हुए वकालत की अनिवार्य अवधि को तीन साल से घटाकर एक साल कर दिया है। हालांकि, न्यायिक सेवा में चयन के बाद कठोर प्रशिक्षण और क्लर्कशिप के जरिए उम्मीदवारों को व्यावहारिक न्यायिक अनुभव दिया जाएगा।


