नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की संविधान पीठ आज, बृहस्पतिवार को ‘उद्योग’ की कानूनी परिभाषा से जुड़े एक बेहद अहम मामले में फैसला सुनाएगी। मामला औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 में ‘उद्योग’ शब्द की व्याख्या से जुड़ा है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने 19 मार्च को मामले में सुनवाई पूरी करने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था।
इस फैसले का असर पुराने कानून के तहत लंबित और मौजूदा औद्योगिक विवादों पर पड़ सकता है। खासतौर पर अस्पतालों, शिक्षण संस्थानों, क्लबों और सरकारी कल्याणकारी गतिविधियों में काम करने वाले कर्मचारियों के श्रम अधिकारों को लेकर इसकी अहमियत काफी बढ़ जाती है।
1978 के फैसले से शुरू हुआ विवाद
इस मामले की जड़ 1978 के बंगलूरू जल आपूर्ति एवं सीवरेज बोर्ड बनाम राजप्पा मामले में दिए गए सुप्रीम कोर्ट के फैसले में है। उस समय सात जजों की पीठ ने ‘उद्योग’ शब्द की व्यापक व्याख्या की थी।
इस व्याख्या के बाद अस्पतालों, शिक्षण संस्थानों, क्लबों और सरकारी कल्याणकारी विभागों जैसी कई संस्थाओं में काम करने वाले कर्मचारियों को औद्योगिक विवाद कानून के तहत संरक्षण मिलने का रास्ता खुला। अब नौ जजों की संविधान पीठ यह तय करेगी कि 1978 में दी गई यह व्यापक व्याख्या सही कानूनी स्थिति थी या नहीं।
सुप्रीम कोर्ट के सामने कौन से बड़े सवाल?
संविधान पीठ के सामने कई महत्वपूर्ण कानूनी सवाल हैं। सबसे अहम सवाल यह है कि 1978 के फैसले में न्यायमूर्ति वीआर कृष्ण अय्यर द्वारा बताए गए परीक्षण के आधार पर किसी संस्था या उपक्रम को ‘उद्योग’ मानना अब भी सही कानूनी स्थिति है या नहीं।
पीठ 1982 में औद्योगिक विवाद कानून में किए गए संशोधनों और 2020 की औद्योगिक संबंध संहिता के प्रावधानों के प्रभाव की भी समीक्षा करेगी।
सरकारी कल्याणकारी योजनाएं भी दायरे में आएंगी?
इस मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू सरकारी विभागों और उनकी संस्थाओं द्वारा संचालित सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों से जुड़ा है। अदालत यह भी तय कर सकती है कि ऐसी गतिविधियों और योजनाओं को औद्योगिक गतिविधि माना जा सकता है या नहीं।
यदि ऐसी गतिविधियां ‘उद्योग’ की परिभाषा में आती हैं, तो उनसे जुड़े कर्मचारियों के श्रम अधिकार, सेवा संबंधी विवाद और कानूनी संरक्षण प्रभावित हो सकते हैं।
2020 की औद्योगिक संबंध संहिता का क्या असर?
सुप्रीम कोर्ट के सामने यह सवाल भी है कि औद्योगिक विवाद अधिनियम की जगह लागू हुई औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 का ‘उद्योग’ की पुरानी कानूनी व्याख्या पर क्या प्रभाव पड़ेगा। यह संहिता 21 नवंबर 2025 से प्रभावी हुई है।
हालांकि, नौ जजों की पीठ ने स्पष्ट किया है कि उसका फैसला पुराने कानून के तहत लंबित और मौजूदा विवादों को नियंत्रित करेगा। इसलिए फैसले का तत्काल कानूनी महत्व भी काफी अधिक माना जा रहा है।
1978 के फैसले ने क्या बदला था?
1978 के फैसले ने ‘उद्योग’ की परिभाषा को काफी व्यापक कर दिया था। इसके बाद ऐसे कई संस्थानों के कर्मचारी भी औद्योगिक विवाद कानून के संरक्षण के दायरे में आ गए, जिन्हें पारंपरिक रूप से उद्योग नहीं माना जाता था।
अस्पताल, शिक्षण संस्थान, क्लब और सरकारी कल्याणकारी विभाग इसके प्रमुख उदाहरण रहे हैं। अब नौ जजों की संविधान पीठ की समीक्षा यह तय करेगी कि चार दशक से अधिक पुरानी इस व्यापक व्याख्या को बरकरार रखा जाए या कानूनी स्थिति में बदलाव किया जाए।


