भोपाल में आवासीय भवनों के व्यावसायिक उपयोग पर नगर निगम की कार्रवाई ने एक गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है—मकान में दुकान खुली तो आखिर जिम्मेदार कौन है? एक तरफ सुप्रीम कोर्ट के आदेश और नियमों के पालन का सवाल है, दूसरी तरफ उन हजारों छोटे कारोबारियों की रोजी-रोटी है, जिन्होंने वर्षों से इन्हीं परिसरों में कारोबार खड़ा किया है। नगर निगम अब तक 7158 नोटिस जारी कर चुका है और आगे सीलिंग की कार्रवाई की तैयारी है। ऐसे में समस्या केवल अतिक्रमण या अवैध व्यावसायिक गतिविधि की नहीं, बल्कि प्रशासनिक नियोजन की भी है।
व्यापारियों का सवाल वाजिब है कि यदि किसी दुकान को वर्षों तक बिजली का व्यावसायिक कनेक्शन मिला, संपत्ति का पंजीयन हुआ, नगर निगम ने कर वसूला और संबंधित विभागों ने कारोबार चलता रहने दिया, तो अचानक कार्रवाई की जिम्मेदारी केवल दुकानदार पर क्यों तय हो? सरकार और स्थानीय निकायों को यह जवाब देना होगा कि इतने वर्षों तक नियमों का पालन कराने की जिम्मेदारी किसकी थी।
दूसरी ओर यह भी सच है कि आवासीय क्षेत्रों का अनियंत्रित व्यावसायीकरण शहर की यातायात व्यवस्था, पार्किंग, पर्यावरण और नागरिक सुविधाओं पर दबाव बढ़ाता है। इसलिए न्यायालय के आदेश को नजरअंदाज करना समाधान नहीं हो सकता। लेकिन हजारों परिवारों की आजीविका पर एक झटके में ताला लगाना भी न्यायसंगत रास्ता नहीं माना जा सकता।
व्यापारियों ने सरकार के सामने मास्टर प्लान लागू करने, गुजरात की तर्ज पर मिक्स लैंड यूज नीति अपनाने और सीलिंग रोकने जैसे विकल्प रखे हैं। सरकार को इन मांगों को राजनीतिक दबाव के बजाय शहरी नियोजन की व्यापक समस्या के रूप में देखना चाहिए।
सबसे जरूरी है कि सरकार, नगर निगम और व्यापारियों के बीच संवाद हो। जहां नियमों के तहत नियमितीकरण संभव है, वहां स्पष्ट नीति बनाई जाए। जहां व्यावसायिक गतिविधियां वास्तव में प्रतिबंधित हैं, वहां कारोबारियों को वैकल्पिक व्यवस्था और पर्याप्त समय दिया जाए।
भोपाल को बंद कराने की धमकी या अंधाधुंध सीलिंग—दोनों ही अतिवादी रास्ते हैं। असली समाधान उस व्यवस्था की समीक्षा में है, जिसने वर्षों तक नियमों और वास्तविकता के बीच की दूरी बढ़ने दी। सवाल सिर्फ यह नहीं कि मकान में दुकान क्यों खुली; सवाल यह भी है कि उसे खुलने और वर्षों तक चलते रहने किसने दिया?


