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    नारदजी कहिन-भाजपा मुख्यालय में कुक से कैश तक नेपाली राज!

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    -महेश दीक्षित

    मप्र भाजपा मुख्यालय में भले ही पार्टी का संगठनात्मक राज चलता हो, लेकिन इन दिनों भाजपाई गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा किसी और ही राज की है। चर्चा है कि यहां कुक से लेकर कैश तक नेपाली राज का असर दिखाई देता है। कहते हैं कि मुख्यालय में पदाधिकारियों में मची अदृश्य पावर वॉर की एक बड़ी वजह भी यही नेपाली फैक्टर है। पुराने भोपाली कार्यकर्ता तो यह कहते सुने जा सकते हैं कि यहां संगठनात्मक काम कम और नेपाली राज ज्यादा चलता है। नारदजी कहते हैं कि भाजपा मुख्यालय में पांच दशक में कई प्रदेश अध्यक्ष आए और चले गए, लेकिन नेपाली राज की जड़ें ऐसी मजबूत रहीं कि कोई भी उसे हिला नहीं सका। यही वजह है कि आज भी मुख्यालय के भीतर जब सत्ता संतुलन की चर्चा होती है, तो कुक और कैश के बहाने नेपाली राज का किस्सा जरूर छिड़ जाता है।

    साहब से परेशान मंत्रीजी!

    प्रदेश सरकार में सामाजिक न्याय विभाग के मंत्रीजी इन दिनों अपने ही विभाग के सचिव स्तर के एक साहब से खासे परेशान बताए जा रहे हैं। चर्चा है कि मंत्रीजी की ओर से भेजी जाने वाली हर अहम फाइल साहब के दफ्तर में पहुंचते ही नियम-कायदों के जाल में उलझा दी जा रही है। पिछले दिनोंं तबादलों की फाइलों का भी यही हाल हुआ। मंत्रीजी जिनके भी तबादले चाहते थे, उन पर कभी नियम, तो कभी प्रक्रिया का हवाला देकर ब्रेक लगा दिया गया। दिलचस्प यह है कि जिन फाइलों में साहब की विशेष रुचि रही, वे बिना अड़चन के आगे बढ़ गईं। इतना ही नहीं, पार्टी नेतृत्व की सिफारिश वाले कुछ तबादले भी इसलिए अटक गए, क्योंकि उनकी फाइल मंत्रीजी द्वारा भेजी गई थी। बताते हैं कि मंत्रीजी ने अपनी तकलीफों की लिखित शिकायत मुख्यमंत्री तक पहुंचा दी है। अब देखना यह है कि मंत्रीजी का रूआब भारी पड़ता है या फिर साहब का अंदाज?

    चावल कांड के आरोपियों के समर्थन में उतरे पूर्व मंत्री!

    गरीबों, मजदूरों और आदिवासियों के हक की लड़ाई लडऩे का दावा करते हुए वर्षों से राजनीति कर रहे भाजपा के एक वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री (भाऊ) अब कथित चावल कांड के आरोपियों के समर्थन में खड़े नजर आ रहे हैं। दरअसल, हाल ही में बालाघाट में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान नेताजी ने चावल कांड के आरोपों से घिरे राइस मिलर्स को खुलकर समर्थन देने का भरोसा दिलाया। उन्होंने कहा, कोई आपका साथ दे या न दे, मैं आपके साथ हूं। इतना ही नहीं, उन्होंने आरोपियों को भरोसा दिलाते हुए कहा कि डरने की जरूरत नहीं है। वह स्वयं उन्हें मुख्यमंत्री से मिलवाएंगे। बताते हैं कि इसके बाद नेताजी आरोपी राइस मिलर्स और एक अन्य पूर्व मंत्री (आरोपियों का अप्रत्यक्ष साझेदार) को लेकर मुख्यमंत्री से मुलाकात कराने पहुंचे भी। नेताजी के इस समर्थन से चावल कांड के आरोपी भले ही राहत महसूस कर रहे हों, लेकिन आम जनता और पार्टी कार्यकर्ता कई सवाल कर रहे हैं। सवाल यह है कि आखिर ऐसी कौन-सी राजनीतिक मजबूरी है, जिसके चलते नेताजी को आरोपी राइस मिलर्स के पक्ष में खुलकर खड़ा होना पड़ रहा है?

    संगठन के निशाने पर माननीय

    भाजपा में संगठन को सर्वोपरि माना जाता है। पार्टी की परंपरा भी यही रही है कि यदि संगठन का कोई वरिष्ठ पदाधिकारी बैठक या प्रशिक्षण वर्ग बुलाए, तो उसमें आमंत्रित जनप्रतिनिधियों की उपस्थिति अपेक्षित होती है। बिना किसी ठोस कारण के अनुपस्थित रहने पर जवाब भी देना पड़ता है। हाल ही में क्षेत्रीय संगठन मंत्री की मौजूदगी में छिंदवाड़ा में भाजपा का प्रशिक्षण वर्ग आयोजित किया गया था। इसमें जिले के पदाधिकारियों के साथ सभी विधायकों को अनिवार्य रूप से उपस्थित रहने के निर्देश थे। लेकिन शाही मिजाज वाले एक माननीय विधायक इस महत्वपूर्ण आयोजन से नदारद रहे। जब उनकी अनुपस्थिति की वजह तलाश की गई, तो पता चला कि माननीय उस समय जिले से बाहर परिवार के साथ कुल्लू-मनाली में मौज फरमा रहे थे। चर्चा है कि इसके बाद से उनकी गैरहाजिरी को संगठन ने गंभीरता से लिया है और वह संगठन के निशाने पर आ गए हैं। नारदजी बता दें कि संबंधित विधायक विधानसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस छोडक़र भाजपा में शामिल हुए थे। शायद अभी उन्हें भाजपा के संगठनात्मक अनुशासन और कार्यशैली का पूरा पाठ पढऩा बाकी है।

    साहब, पांच हजार भी ले लेते हैं!

    मध्य प्रदेश के एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी, जो इन दिनों भोपाल संभाग के एक जिले में कलेक्टर के पद पर पदस्थ हैं, अपनी कार्यशैली से अधिक कथित लेन-देन की चर्चाओं को लेकर प्रशासनिक गलियारों में चर्चाओं में हैं। चर्चा है कि साहब पर कमाई का ऐसा जुनून सवार है कि रकम पांच हजार रुपये की हो या पांच लाख की, उसे स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं होता। कलेक्टर साब के लिए रकम का आकार नहीं, बल्कि आमदनी मायने रखती है, चाहे वह किसी भी माध्यम से क्यों न आए। बताया जाता है कि इससे पहले जब वे एक नक्सल प्रभावित आदिवासी जिले में पदस्थ थे, तब भी उनकी यही कथित कार्यशैली चर्चा का विषय बनी थी। हालात ऐसे थे कि आम लोगों से लेकर रसूखदारों तक के बीच यह टिप्पणी सुनने को मिलती थी-लेन-देन की बातें तो हर जगह होती हैं, लेकिन ऐसे कलेक्टर साब पहली बार देखे, जो पांच हजार रुपये भी नहीं छोड़ते। नारदजी बता दें कि 2013 बैच के ये आईएएस अधिकारी कथित तौर पर ‘हम भ्रष्टन के, भ्रष्ट हमारे’ सिद्धांत पर कुछ ज्यादा ही यकीन रखते हैं।

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