महेश दीक्षित/भोपाल
भाजपा के एक सांसदजी इन दिनों अपने नए पते को लेकर राजनीतिक गलियारों में खासे चर्चित हैं। कहते हैं कि सांसदजी कहीं और मिलें या न मिलें, लेकिन उनके नए ठिकाने काबुली वाले पर उनसे मुलाकात की पूरी संभावना रहती है। हालांकि, यहां भी मुलाकात का अपना अलग ही प्रोटोकॉल है। चर्चा है कि सांसदजी से मिलने से पहले काबुली वाले की मंजूरी जरूरी होती है। वही तय करता है कि किसे समय मिलेगा और किसे नहीं। यदि उसकी ओर से हरी झंडी मिल गई, तो समझिए मुलाकात तय है। लेकिन इतना ही काफी नहीं। बताते हैं कि मुलाकात सिर्फ औपचारिक नहीं होनी चाहिए, उसमें शुभ-लाभ का भाव भी दोनों ओर से बना रहना चाहिए। सांसदजी के करीबी कहते हैं कि बिना शुभ-लाभ की भावना के पहुंचने वाले आमजनों के लिए फिलहाल माननीय का समय उपलब्ध नहीं है। क्योंकि चुनाव अभी दूर हैं।
चर्चाओं में एमएलए का बंगला!
भोपाल की पॉश कॉलोनी 74 बंगला स्थित एक सरकारी बंगला इन दिनों सत्ता और संगठन के गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। यह बंगला मालवांचल के एक बेहद लोकप्रिय और प्रभावशाली भाजपा विधायक को आवंटित है। कहते हैं कि दिन के समय यहां सन्नाटा पसरा रहता है, लेकिन रात ढलते ही बंगले का नजारा बदल जाता है। देर रात तक गाडिय़ों की आवाजाही, नेताओं का आना-जाना और बंद कमरों में लंबी बैठकों का दौर शुरू हो जाता है। चर्चा तो यहां तक है कि रात 10 बजे के बाद संघ और भाजपा के कई बड़े पदाधिकारी यहां जुटते हैं और फिर चिंतन-मंथन का सिलसिला अलसुबह तक चलता रहता है। अब इन बैठकों में क्या रणनीति बनती है, किसके भविष्य पर चर्चा होती है और किसके समीकरण तय होते हैं, यह तो वही लोग जानें। लेकिन राजनीतिक गलियारों में इतना जरूर कहा जा रहा है कि इन दिनों कई बड़े राजनीतिक फैसलों की पटकथा शायद इसी एमएलए बंगले से लिखी जा रही है।
बेनामी साम्राज्य को लेकर बेचैन नेताजी
मप्र भाजपा के बुंदेलखंड वाले एक कद्दावर नेताजी इन दिनों बड़ी चिंता में बताए जाते हैं। कभी शिवराज सरकार के सबसे ताकतवर महकमों में से एक के मंत्री रहे नेताजी की परेशानी न चुनाव है, न संगठन… बल्कि चिंता उस संपत्ति साम्राज्य की है, जो कथित तौर पर अपनों और भरोसेमंदों के नाम खड़ा किया गया था। कहते हैं कि सत्ता में रहते जिस इलाके का दरोगा इशारे समझ जाता था, वही अब नेताजी को पहचानने में भी वक्त लगा रहा है। उधर, जिन विश्वासपात्रों के नाम करोड़ों की अचल संपत्तियां खरीदी गई थीं, वे भी अब अपने-अपने हिसाब से स्वतंत्र राजनीति करने लगे हैं। किसी ने फोन उठाना छोड़ दिया, तो किसी ने मिलना। नारदजी कहते हैं, सत्ता की कुर्सी का पावर उतरते ही सरकारी सलाम कम हो जाए, यह तो राजनीति का शाश्वत सत्य है। लेकिन जब अपने ही लोग आंखें फेरने लगें और करोड़ों की कथित बेनामी संपत्तियां हाथ से फिसलती दिखने लगें, तब नेताजी का परेशान होना लाजिमी हो जाता है।
सीएस की कुर्सी…सिंहस्थ का गणित
राज्य मंत्रालय के गलियारों में इन दिनों मुख्य सचिव की कुर्सी को लेकर चर्चायेंं है। कोई कहता है आर-आर, के-सी और ए-बी आएंगे, तो सरकार को जल्द ही सेवा विस्तार का जुगाड़ करना पड़ेगा। एन-एम का नाम भी हवा में है, लेकिन उनके आते ही पांच वरिष्ठ एसीएस को मंत्रालय से बाहर का रास्ता दिखाना पड़े, यह बात कई साहबों की नींद उड़ा रही है। बताते हैं, सरकार की असली चिंता न केवल कुर्सी है, न केवल वरिष्ठता। असली चिंता है सिंहस्थ और उसके बाद आने वाला विधानसभा चुनाव। ऐसे में सरकार बार-बार सीएस बदलने या सेवा विस्तार के चक्कर में पडऩा नहीं चाहती। इसीलिए मालवा वाले पी-ए का पलड़ा भारी बताया जा रहा है। न वरिष्ठता का बड़ा झंझट, न जल्द रिटायरमेंट की चिंता। ऊपर से मालवा कनेक्शन अलग। अब देखना यह है कि फैसले में प्रशासनिक वरिष्ठता जीतती है या राजनीतिक गणित। आखिर भोपाल में कुर्सियां केवल वरिष्ठता से नहीं, समीकरणों से भी तय होती हैं।
शिक्षा विभाग में साले साहब का जलवा!
मप्र के स्कूली शिक्षा विभाग में इन दिनोंं एक साहब अपनी कार्यशैली को लेकर चर्चाओं में हैं। कहते हैं कि साहब सरकारी नियमों से पहले घर की कैबिनेट का फैसला मानते हैं। महकमे की कोई अहम फाइल हो, नोटशीट हो या खरीद से जुड़ा कोई मामला, अंतिम राय पहले बीबी साहिबा से ली जाती है। हाल ही में विभाग में कुछ खरीद के लिए टेंडर निकालने की तैयारी थी। साहब ने घर में सलाह-मशविरा किया तो फरमान आया टेंडर निकालने की जरूरत ही क्या है? जो काम कराना है, मेरे भाई (साले साहब) से करा लीजिए। फायदा बाहर वालों को क्यों मिले? बस फिर क्या था! बताते हैं कि विभाग में टेंडरों की हवा का रुख ही बदल गया और महकमे के सार काम साले साहब की ओर मुडऩे लगे। बताते हैं कि इस साला राज की चर्चा मुख्यमंत्री सचिवालय तक पहुंच चुकी है। अब देखना यह है कि सीएम सचिवालय से इस कहानी का अगला अध्याय लिखा जाता है या फिर साले साहब का जलवा यूं ही कायम रहता है।


