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    नारदजी कहिन : बाबू से भाईसाब तक… जन्मदिन का शोर दिल्ली तक!

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    महेश दीक्षित

    मप्र भाजपा के एक पदाधिकारी ‘भाईसाब’ ने इस बार अपना जन्मदिन ऐसे ठाठ-बाट से मनाया कि उसकी गूंज भोपाल से लेकर दिल्ली तक सुनाई दी। जन्मदिन के मौके पर अखबारों में बधाई और शुभकामनाओं के महंगे विज्ञापनों की भरमार रही। लेकिन इन विज्ञापनों से ज्यादा चर्चा उस खर्चे की हो रही है, जिसे देखकर हर कोई यही पूछ रहा है-आखिर इतना पैसा आया कहां से? सियासी गलियारों में याद दिलाया जा रहा है कि ‘भाईसाब’ ने कभी भाजपा मुख्यालय में एक साधारण लिपिक (बाबू) के रूप में कदम रखा था। फिर समय ऐसा बदला कि देखते ही देखते वे पार्टी के खजांची और प्रदेश संगठन के सबसे रसूखदार चेहरों में शामिल हो गए। यह सफर कैसे तय हुआ, इसकी अपनी-अपनी व्याख्याएं हैं। फिलहाल तो उनके जन्मदिन के जश्न और उस पर हुए कथित खर्च की चर्चा भोपाल से लेकर दिल्ली तक खूब हो रही है। बाकी, राजनीति में चर्चाएं चलती रहती हैं… ऐसे में ‘भाईसाब’ को जन्मदिन की शुभकामनाएं तो बनती ही हैं।

    नेताजी को सीएम का सलाहकार बनना है!

    कभी पूर्व मुख्यमंत्री के बेहद करीबी माने जाने वाले और पिछली सरकार में एक निगम की कुर्सी संभाल चुके प्रदेश भाजपा के एक नेताजी इन दिनों अपना नया राजनीतिक ठिकाना तलाश रहे हैं। ये नेताजी एक समय भाजपा के मीडिया विभाग में अहम ओहदे को भी संभाल चुके हैं, इसलिए संगठन और सत्ता के गलियारों की नब्ज़ से वे भली-भांति परिचित माने जाते हैं। कहते हैं कि इन दिनों उनका अधिकांश समय मुख्यमंत्री सचिवालय के गलियारों में बीत रहा है। जहां वे सीएम के बेहद भरोसेमंद लोगों के आसपास अधिक नजर आते हैं। जमीनी पकड़ से ज्यादा जुगाड़ और तिकड़म में माहिर माने जाने वाले इन नेताजी की अब बस एक ही तमन्ना है-किसी तरह मुख्यमंत्री का ‘सलाहकार’ बन जाएं। फिलहाल वे पूरी श्रद्धा, धैर्य और राजनीतिक कौशल के साथ अपनी इस साधना में जुटे हैं। अब देखना दिलचस्प होगा कि उनकी यह आराधना रंग लाती है या फिर मुख्यमंत्री सचिवालय की परिक्रमा ही नेताजी की राजनीतिक नियति बनकर रह जाती है।

    टीम नवीन में मप्र से कौन-कौन?

    पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव संपन्न होने के बाद अब भाजपा की नई राष्ट्रीय टीम को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का दौर तेज हो गया है। सबसे अधिक उत्सुकता इस बात को लेकर है कि नई टीम में मध्य प्रदेश से किन नेताओं को स्थान मिल सकता है। चर्चाओं में पूर्व प्रदेश अध्यक्ष एवं सांसद वीडी शर्मा का नाम सबसे प्रमुख माना जा रहा है। वहीं, राज्यसभा सांसद कविता पाटीदार को भी नई टीम में जिम्मेदारी मिलने की संभावना जताई जा रही है। कविता प्रदेश भाजपा की महामंत्री रह चुकी हैं, ऐसे में महिला प्रतिनिधित्व के आधार पर उनके नाम पर गंभीरता से विचार होने की चर्चा है। इसी क्रम में सांसद गजेंद्र सिंह पटेल का नाम भी संभावित दावेदारों में शामिल बताया जा रहा है। इसके अलावा राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि प्रदेश के दो युवा नेता संगठन में जगह बनाने की उम्मीद के साथ इन दिनों दिल्ली की परिक्रमा कर रहे हैं। अब निगाहें इस पर टिकी हैं कि भाजपा की नई राष्ट्रीय टीम में मध्य प्रदेश के हिस्से कितने पद आते हैं और आखिर किसकी किस्मत चमकती है।

    कांग्रेस में ‘शकुनी’ की तलाश…!

    महाभारत में शकुनी ने दुर्योधन को मोहरा बनाकर ऐसा खेल रचा था कि अंतत: में पूरा कुरु वंश ही तबाह हो गया। मप्र कांग्रेस में भी इन दिनों कुछ वैसा ही खेल चलता दिखाई दे रहा है। फर्क बस इतना है कि यहां ‘शकुनी’ का चेहरा अब तक बेनकाब नहीं हो पाया है। प्रदेश कांग्रेस में चर्चा गर्म है कि पार्टी के भीतर एक ऐसा ‘शकुनी’ है, जिसे राहुल गांधी का नाम तक रास नहीं आता। कहते हैं कि उसने मानो यह प्रण कर लिया है कि चाहे मप्र में कांग्रेस रसातल में चली जाए, लेकिन जब तक राहुल गांधी पार्टी की कमान संभाले हुए हैं, तब तक मप्र कांग्रेस को एकजुट नहीं होने दिया जाएगा। यही वजह है कि हर बड़े फैसले के साथ नया विवाद खड़ा हो जाता है। गुटबाजी की आग बुझने के बजाय और भडक़ उठती है। एक नेता दूसरे की राह में रोड़े अटका रहा है तो दूसरा पहले की राजनीतिक जमीन खिसकाने में जुटा है। बाहर भाजपा से लड़ाई कम और भीतर अपनों से जंग ज्यादा दिखाई दे रही है। नारदजी कहते हैं कि, जिस कांग्रेस को सत्ता तक पहुंचने के लिए एकजुट होना चाहिए, वहां हर कोई दूसरे की राजनीतिक ‘चीरहरण’ में व्यस्त है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर वह ‘शकुनी’ कौन है, जो पर्दे के पीछे बैठकर पासे फेंक रहा है और पूरी कांग्रेस को महाभारत के मैदान में धकेलने पर आमादा है।

    साहब की पांच करोड़ की कोठी!

    मध्य प्रदेश कैडर के 2019 बैच के एक आईएएस अधिकारी, जो इन दिनों प्रदेश के एक आदिवासी जिले में सीईओ के पद पर पदस्थ हैं, अपनी कार्यशैली को लेकर पहले से ही विवादों में रहे हैं। अब वे भोपाल में बन रही अपनी आलीशान कोठी को लेकर प्रशासनिक गलियारों में चर्चा का विषय बने हुए हैं। चर्चा इसलिए भी है कि साहब की नौकरी को अभी महज पांच-छह साल ही हुए हैं। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि आखिर सीईओ रहते-रहते ऐसा कौन-सा ‘पैसों का पेड़’ लग गया कि करीब पांच करोड़ रुपये की आलीशान कोठी खड़ी हो गई। नारदजी कहते हैं कि सरकारी वेतन की कमाई से इतनी महंगी कोठी बनाना आसान तो नहीं लगता। अब इस चर्चा में कितना सच है, यह तो जांच का विषय है, लेकिन प्रशासनिक हलकों में इस कोठी की चर्चा जरूर जोरों पर है।

    #MadhyaPradeshPolitics #MPBJP #MPCongress #PoliticalNews #NaradjiKahin

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