नई दिल्ली। अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम होने तथा शांति समझौते की खबरों के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। बुधवार को ब्रेंट क्रूड 3.1 प्रतिशत टूटकर 74.76 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया, जो पिछले चार महीनों में पहली बार 75 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आया है। वहीं, अमेरिकी क्रूड वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) भी करीब 3 प्रतिशत फिसलकर 71 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार करता दिखा।
युद्ध के बाद सबसे निचले स्तर पर पहुंचा कच्चा तेल
बाजार में कारोबार के दौरान ब्रेंट क्रूड 74.61 डॉलर प्रति बैरल तक लुढ़क गया, जो फरवरी के अंत के बाद का सबसे निचला स्तर माना जा रहा है। इसी तरह WTI भी मार्च के बाद के न्यूनतम स्तर तक पहुंच गया। विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया में तनाव कम होने और तेल आपूर्ति सामान्य होने से कीमतों पर दबाव बढ़ा है।
होर्मुज रूट से सामान्य हुई तेल आपूर्ति
अमेरिका-ईरान समझौते के बाद तेल आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही तेज हुई है। रिपोर्ट्स के अनुसार, समझौते के बाद अब तक कई तेल टैंकर इस मार्ग से सुरक्षित गुजर चुके हैं और बड़ी मात्रा में कच्चा तेल वैश्विक बाजार तक पहुंचा है।
विश्लेषकों का कहना है कि होर्मुज रूट से सप्लाई सामान्य होने की वजह से बाजार में तेल की उपलब्धता बढ़ी है, जिससे कीमतों में गिरावट आई है।
भारत को कैसे मिलेगा फायदा?
भारत अपनी कुल तेल जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। ऐसे में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था और आम लोगों पर पड़ सकता है।
1. पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर दबाव कम
कच्चा तेल सस्ता होने से तेल कंपनियों की लागत घटती है, जिससे पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी की संभावना कम हो जाती है।
2. महंगाई पर लग सकती है लगाम
परिवहन लागत कम रहने से खाद्य पदार्थों, सब्जियों, अनाज और अन्य जरूरी वस्तुओं की कीमतों पर दबाव कम पड़ता है।
3. आयात बिल में कमी
तेल की कीमतें घटने से भारत का आयात खर्च कम होता है, जिससे विदेशी मुद्रा की बचत होती है और चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) नियंत्रित रखने में मदद मिलती है।
4. रुपये को मिल सकता है सहारा
कम तेल आयात बिल का असर रुपये पर भी सकारात्मक पड़ता है, क्योंकि डॉलर की मांग घटती है और भारतीय मुद्रा को मजबूती मिल सकती है।
5. सरकारी वित्त पर राहत
ऊर्जा सब्सिडी और अन्य संबंधित खर्चों में कमी आने से सरकार के वित्तीय बोझ में राहत मिल सकती है।
6. उद्योग और शेयर बाजार को फायदा
ईंधन लागत कम होने से कंपनियों का परिचालन खर्च घटता है, जिससे मुनाफे में सुधार और शेयर बाजार में सकारात्मक माहौल बन सकता है।
होर्मुज संकट से बढ़ी थीं वैश्विक चिंताएं
पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने के दौरान होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका ने वैश्विक बाजारों को झटका दिया था। दुनिया के बड़े हिस्से का तेल और गैस इसी मार्ग से गुजरता है। सप्लाई बाधित होने के डर से ऊर्जा कीमतों में तेजी आई थी और कई देशों में महंगाई बढ़ने की आशंका गहरा गई थी।
अब शांति समझौते और सामान्य होती सप्लाई के बीच बाजार में राहत का माहौल दिख रहा है, जिसका फायदा भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों को मिल सकता है।


