मध्यप्रदेश सरकार द्वारा सोम डिस्टिलरीज समूह के आबकारी लाइसेंस नवीनीकरण आवेदन निरस्त किया जाना केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि वर्षों से चले आ रहे उस तंत्र पर प्रहार है, जिसमें प्रभावशाली उद्योगों को नियमों से ऊपर समझने की प्रवृत्ति विकसित हो गई थी। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के निर्देश पर लिया गया यह फैसला उन सवालों को भी सामने लाता है, जिन्हें लंबे समय तक दबाने की कोशिश की जाती रही।
आबकारी आयुक्त के आदेश में साफ कहा गया है कि लाइसेंस का नवीनीकरण कोई जन्मसिद्ध अधिकार नहीं है। किसी भी संस्था को यह सुविधा तभी मिल सकती है, जब उसका आचरण, कानूनी अनुपालन और सार्वजनिक हित के प्रति जिम्मेदारी संदेह से परे हो। लेकिन जब किसी समूह का नाम अवैध शराब परिवहन, कूटरचित परमिटों के उपयोग, राजस्व हानि और आबकारी कानूनों के गंभीर उल्लंघनों से जुड़ता रहा हो, तब सरकार के सामने कठोर निर्णय लेने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता।
सबसे बड़ा प्रश्न पर्यावरण का है। पिछले दो दशकों से प्रदेश की नदियों और जल स्रोतों को लेकर जो शिकायतें सामने आती रही हैं, वे किसी से छिपी नहीं हैं। सामाजिक संगठनों, स्थानीय नागरिकों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने बार-बार आरोप लगाए कि औद्योगिक गतिविधियों के कारण जल स्रोत प्रदूषित हुए, लेकिन कार्रवाई के नाम पर केवल औपचारिकताएं निभाई जाती रहीं। यह धारणा मजबूत होती गई कि प्रभावशाली उद्योगों को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है, इसलिए नियम उनके लिए अलग हैं और आम नागरिकों के लिए अलग।
यदि वास्तव में नदियों, भूजल और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले मामलों की निष्पक्ष जांच हो, तो कई असहज सच सामने आ सकते हैं। विकास के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों की कीमत चुकाने के लिए जनता को मजबूर नहीं किया जा सकता। उद्योग जरूरी हैं, लेकिन कानून और पर्यावरण से ऊपर कोई नहीं हो सकता।
सरकार का यह निर्णय स्वागत योग्य है, लेकिन असली परीक्षा अब शुरू होती है। केवल लाइसेंस निरस्त कर देना पर्याप्त नहीं होगा। यह भी सुनिश्चित करना होगा कि पर्यावरणीय क्षति, राजस्व हानि और कानूनी उल्लंघनों के लिए जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय हो। यदि कार्रवाई केवल कागजों तक सीमित रही, तो यह भी पिछली कई कार्रवाइयों की तरह एक औपचारिक घोषणा बनकर रह जाएगी।
जनता यह देखना चाहती है कि क्या यह फैसला वास्तव में सुशासन की दिशा में उठाया गया कदम है या फिर कुछ समय बाद प्रभाव और दबाव के आगे व्यवस्था फिर झुक जाएगी। मध्यप्रदेश की नदियां, पर्यावरण और जनता अब प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि निर्णायक कार्रवाई की अपेक्षा कर रही हैं।


