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    शिव के पिता कौन हैं? जानिए पुराणों में वर्णित सृष्टि की रोचक कथा

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    हिंदू धर्म में भगवान शिव को अनादि और अनंत माना गया है। उनसे जुड़ी एक रोचक कथा प्रचलित है। कहा जाता है कि एक बार भगवान शिव से पूछा गया, “आपके पिता कौन हैं?” तब उन्होंने ब्रह्मा का नाम लिया। फिर प्रश्न हुआ, “ब्रह्मा के पिता कौन हैं?” शिव ने उत्तर दिया, “विष्णु।” इसके बाद जब पूछा गया, “विष्णु के पिता कौन हैं?” तब भगवान शिव मुस्कराकर बोले, “मैं स्वयं।” यह कथा सृष्टि की उत्पत्ति और त्रिदेवों के पारस्परिक संबंध को प्रतीकात्मक रूप से दर्शाती है।

    पुराणों के अनुसार, महाप्रलय के बाद समस्त सृष्टि नष्ट हो गई और लंबे समय तक चारों ओर अंधकार व्याप्त रहा। इसके पश्चात वर्षा हुई और संपूर्ण पृथ्वी जलमग्न हो गई। इसी जल से भगवान विष्णु प्रकट हुए। जब उन्होंने नेत्र खोले, तब उनके नेत्रों से सूर्य और हृदय से चंद्रमा की उत्पत्ति हुई।

    जल से उत्पन्न होने के कारण विष्णु को ‘हिरण्यगर्भ’ भी कहा गया है। उनकी नाभि से एक दिव्य कमल प्रकट हुआ और उस कमल से ब्रह्मा का जन्म हुआ। इसके बाद ब्रह्मा के मस्तक से एक दिव्य ज्योति प्रकट हुई, जिससे भगवान महेश (शिव) प्रकट हुए। ब्रह्मा और महेश ने अपने अस्तित्व के बारे में प्रश्न किया, तब विष्णु ने उन्हें सृष्टि के विस्तार का कार्य सौंपा।

    जीवन की उत्पत्ति और विकास

    इस काल में जल में सूक्ष्म जीवों की उत्पत्ति हुई तथा असंख्य वनस्पतियां और लताएं विकसित होने लगीं। समय के साथ जीव-जगत का विस्तार हुआ और विभिन्न प्रकार के प्राणी अस्तित्व में आए। पुराणों के अनुसार यह सब ब्रह्मा की तपस्या और सृजन शक्ति का परिणाम था।

    मानव जाति की उत्पत्ति

    ब्रह्मा ने विचार किया कि एक ऐसे प्राणी की रचना की जाए जो अन्य जीवों की अपेक्षा अधिक बुद्धिमान हो। सबसे पहले उन्होंने चार सनत कुमारों को उत्पन्न किया, लेकिन वे संसार के विस्तार में रुचि लेने के बजाय तपस्या में लीन हो गए।इसके बाद ब्रह्मा ने अपने दस मानस पुत्रों—मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, वशिष्ठ आदि—की उत्पत्ति की और उन्हें सृष्टि विस्तार का दायित्व सौंपा। किंतु वे भी तप और ज्ञान में लीन रहे। तब ब्रह्मा ने स्वयं पुरुष रूप में स्वायंभुव मनु और स्त्री रूप में शतरूपा की रचना की तथा उन्हें मानव जाति के विस्तार का आदेश दिया। इन्हीं से मानव वंश की शुरुआत मानी जाती है।

    वेद ज्ञान की परंपरा

    वेदों को ईश्वर की वाणी माना गया है। परंपरा के अनुसार इस दिव्य ज्ञान को सर्वप्रथम अग्नि, वायु, अंगिरा और आदित्य ऋषियों ने ग्रहण किया। बाद में यह ज्ञान स्वायंभुव मनु और उनके वंशजों के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ता रहा।

    त्रिदेव और सृष्टि विस्तार

    पुराणों में वर्णित है कि भगवान शिव ने दक्ष प्रजापति की पुत्री सती से विवाह किया, जबकि भगवान विष्णु ने भृगु ऋषि की पुत्री लक्ष्मी को अपनी अर्धांगिनी बनाया। इसके बाद ब्रह्मा, विष्णु और महेश के सहयोग से देव, दानव, दैत्य, मानव, नाग, किन्नर, वानर और अनेक प्रकार के जीवों का विस्तार हुआ।

    ऋषभदेव और भारतवर्ष का नामकरण

    स्वायंभुव मनु के वंश में पांचवीं पीढ़ी में भगवान ऋषभदेव का जन्म हुआ। वंश क्रम इस प्रकार बताया गया है—स्वायंभुव मनु, प्रियव्रत, अग्नीध्र, नाभि और फिर ऋषभदेव।

    ऋषभदेव ने मानव समाज को कृषि, व्यापार, विद्या, शिल्प और सामाजिक जीवन की अनेक विधाओं का ज्ञान दिया। उनके सौ पुत्रों में भरत और बाहुबली विशेष रूप से प्रसिद्ध हुए। माना जाता है कि भरत के नाम पर ही इस भूभाग का नाम ‘भारतवर्ष’ पड़ा।

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