महेश दीक्षित
Madhya Pradesh Politics: मप्र भाजपा में प्रदेश संगठन महामंत्री की नियुक्ति ने पार्टी के भीतर संगठन की आगामी दिशा को लेकर नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है। आठ महीने तक खाली रहे इस पद पर राष्ट्रीय संगठन ने संघ पृष्ठभूमि के चंद्रशेखर को जिम्मेदारी सौंपी है। उनका केंद्र भोपाल रहेगा और वे प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल के साथ मिलकर संगठन की कमान संभालेंगे।
चंद्रशेखर की नियुक्ति इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि वे मप्र की स्थानीय सांगठनिक पृष्ठभूमि से नहीं आते। मूल रूप से उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के रहने वाले चंद्रशेखर संघ के प्रचारक रहे हैं। काशी क्षेत्र और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में काम करने के बाद उन्होंने सितंबर 2017 से राजस्थान भाजपा में संगठन महामंत्री की जिम्मेदारी संभाली। छह साल राजस्थान में काम करने के बाद जनवरी 2024 में उन्हें तेलंगाना भाजपा का प्रदेश महामंत्री संगठन बनाया गया। अब उन्हें मध्य प्रदेश भेजा गया है।
स्थानीय परंपरा से अलग प्रयोग
मप्र भाजपा के संगठन महामंत्री पद का इतिहास देखें तो यहां अब तक यह जिम्मेदारी संभालने वाले प्रमुख चेहरों की सांगठनिक जड़ें प्रदेश से जुड़ी रही हैं। कप्तान सिंह सोलंकी, माखन सिंह, सुहास भगत और हितानंद शर्मा जैसे नेताओं ने प्रदेश संगठन में लंबा काम किया। 2022 में सुहास भगत के बाद हितानंद शर्मा को पूर्णकालिक संगठन महामंत्री बनाया गया था। जनवरी 2026 में हितानंद की संघ में वापसी के बाद यह पद खाली था। ऐसे में चंद्रशेखर की नियुक्ति को मप्र भाजपा के लिए एक अलग तरह का संगठनात्मक प्रयोग कहा जा सकता है। हालांकि इसे किसी स्थानीय नेतृत्व की उपेक्षा के रूप में देखना जल्दबाजी होगी। भाजपा में संगठन महामंत्री का पद मूलतः संगठनात्मक अनुभव, संघ पृष्ठभूमि और व्यापक सांगठनिक जिम्मेदारियों के अनुभव से जुड़ा रहा है।
क्षेत्रीय व्यवस्था से प्रदेश स्तर तक
मप्र भाजपा में संगठनात्मक व्यवस्था का भी अपना इतिहास रहा है। एक दौर में प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में क्षेत्रीय संगठन मंत्रियों के जरिए संगठन का संचालन होता था। बाद में प्रदेश स्तर पर एकीकृत संगठन महामंत्री की व्यवस्था लागू हुई। इस बदलाव ने संगठन के निर्णयों और कार्यकर्ता तंत्र को एक केंद्रीय ढांचे में समेटने का काम किया। पिछले वर्षों में भी इस पद की भूमिका सिर्फ बैठकों और नियुक्तियों तक सीमित नहीं रही। प्रदेश संगठन महामंत्री प्रदेश अध्यक्ष, जिला संगठन, मंडल और बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय की महत्वपूर्ण कड़ी होते हैं। सत्ता में भाजपा की सरकार होने की स्थिति में सरकार और संगठन के बीच संवाद भी इस पद की अहम जिम्मेदारी बन जाता है।
चंद्रशेखर के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या?
चंद्रशेखर के सामने मध्य प्रदेश में सबसे पहली चुनौती किसी चुनाव की तत्काल तैयारी से ज्यादा संगठन को समझने और उसे अपने तरीके से व्यवस्थित करने की होगी। मप्र भौगोलिक, सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से बेहद विविध राज्य है। मालवा, निमाड़, महाकौशल, विंध्य, बुंदेलखंड, ग्वालियर-चंबल और मध्य भारत-हर क्षेत्र की अपनी राजनीतिक परिस्थितियां और सांगठनिक प्राथमिकताएं हैं।
चंद्रशेखर को राजस्थान और तेलंगाना जैसे अलग राजनीतिक-सामाजिक परिवेश वाले राज्यों में काम करने का अनुभव है। अब देखना यह होगा कि वे उस अनुभव को मध्य प्रदेश की स्थानीय परिस्थितियों के साथ किस तरह जोड़ते हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान वाराणसी में उनकी सांगठनिक भूमिका का भी उल्लेख मिलता है। इसके बाद राजस्थान और तेलंगाना में लंबी जिम्मेदारियां संभालना बताता है कि उनका अनुभव केवल एक राज्य तक सीमित नहीं रहा है।
गुटों के बीच समन्वय से लेकर बूथ तक नजर
भाजपा के किसी भी बड़े संगठनात्मक पद की असली परीक्षा कागजों पर नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं के बीच होती है। मप्र में सरकार, प्रदेश संगठन, क्षेत्रीय नेतृत्व, सांसदों, विधायकों और जिला इकाइयों के बीच बेहतर तालमेल बनाए रखना चंद्रशेखर की प्रमुख जिम्मेदारियों में रहेगा। यह बड़ी चुनौती भी होगी। खास तौर पर ऐसे समय में, जब भाजपा प्रदेश में सत्ता में है और संगठन को लगातार सक्रिय रखने की चुनौती है, संगठन महामंत्री की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाती है। उन्हें एक ओर सरकार के कामकाज और संगठन की अपेक्षाओं के बीच संवाद कायम करना होगा, तो दूसरी ओर कार्यकर्ताओं की स्थानीय समस्याओं और राजनीतिक आकांक्षाओं को भी समझना होगा। इस नियुक्ति का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू संघ-भाजपा समन्वय है। जनवरी में हितानंद शर्मा की संघ में वापसी और अब चंद्रशेखर की नियुक्ति के बाद प्रदेश भाजपा के संगठन में संघ पृष्ठभूमि का अनुभव एक बार फिर केंद्रीय भूमिका में दिखाई देता है। इसलिए चंद्रशेखर की नियुक्ति को केवल ‘बाहरी व्यक्ति की एंट्री’ के नजरिये से देखना अधूरा होगा। असली सवाल यह है कि वे मप्र की जटिल सामाजिक-सियासी संरचना को कितनी जल्दी समझते हैं और संगठन की मौजूदा ताकत को किस तरह आगे बढ़ाते हैं।
मप्र भाजपा ने इस बार स्थानीय अनुभव की परंपरा से आगे बढ़कर व्यापक संगठनात्मक अनुभव वाले चेहरे पर भरोसा किया है। अब इस प्रयोग की सफलता का आकलन किसी नियुक्ति के आधार पर नहीं, बल्कि आने वाले समय में संगठन की कार्यशैली, कार्यकर्ताओं से संवाद, सत्ता-संगठन समन्वय और प्रदेश की अलग-अलग इकाइयों में दिखाई देने वाली सांगठनिक सक्रियता से होगा।


