Cancer Medicine Price: कैंसर केवल शरीर को नहीं, पूरे परिवार को आर्थिक और मानसिक रूप से झकझोर देता है। ऐसे में यदि जीवन बचाने वाली दवाओं की कीमत में ही कई गुना का अंतर सामने आए तो सवाल केवल मुनाफे का नहीं, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था की संवेदनशीलता का भी है। कैंसर की दस प्रमुख दवाओं की कीमतों के विश्लेषण में सरकारी खरीद दर और अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) के बीच तीन से 38 गुना तक का अंतर सामने आना चिंताजनक है।
पैक्लिटैक्सेल 260 एमजी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। सरकारी खरीद में इसकी कीमत करीब 333 रुपये बताई गई है, जबकि अलग-अलग ब्रांड की एमआरपी 10 हजार से 12,500 रुपये तक है। इसी तरह डोसेटैक्सेल 120 एमजी की सरकारी खरीद दर करीब 369 रुपये है, जबकि कुछ ब्रांडों की एमआरपी 13,500 रुपये तक पहुंचती है। सवाल यह नहीं कि सरकार को बड़ी मात्रा में खरीद के कारण कम कीमत मिलती है। सवाल यह है कि संस्थागत खरीद में जब इतनी कम कीमत संभव है तो मरीज के सामने वही दवा कई गुना महंगी क्यों पहुंचती है?
नेशनल फार्मास्यूटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी ने 42 नॉन-शेड्यूल्ड कैंसर दवाओं पर ट्रेड मार्जिन की अधिकतम सीमा 30 प्रतिशत तय की है। इससे 500 से अधिक ब्रांडों की कीमतों में कमी भी आई। लेकिन कैंसर की सभी दवाएं इस व्यवस्था के दायरे में नहीं हैं। यही वह खामी है जिस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।
एक ही दवा अलग-अलग कंपनियां अलग-अलग ब्रांड नामों से बेचती हैं और उनकी कीमतों में बड़ा अंतर हो सकता है। मरीज को एमआरपी और अपनी जेब से चुकाई रकम तो पता होती है, लेकिन अस्पताल या मेडिकल स्टोर ने वह दवा कितने में खरीदी, इसकी जानकारी नहीं होती। यही अपारदर्शिता मुनाफे की गुंजाइश पैदा करती है।
नेशनल कैंसर ग्रिड के तहत अस्पतालों द्वारा सामूहिक खरीद का अनुभव बताता है कि कीमतें काफी नीचे लाई जा सकती हैं। शुरुआत में 23 अस्पतालों के लिए 40 प्रमुख कैंसर दवाओं की सामूहिक खरीद में कंपनियों से एमआरपी पर औसतन 82 प्रतिशत तक छूट मिली और बड़ी बचत हुई।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा दवाओं की कीमत और अस्पतालों के मार्जिन पर सवाल उठाया जाना इसलिए महत्वपूर्ण है। कैंसर मरीज को बीमारी से लड़ना चाहिए, कीमतों की व्यवस्था से नहीं। सरकार को दवाओं की वास्तविक खरीद कीमत, अस्पताल के मार्जिन और मरीज से वसूली जाने वाली कीमत के बीच पारदर्शिता सुनिश्चित करनी होगी। जीवन रक्षक दवाओं को बाजार की मुनाफाखोरी से बचाना स्वास्थ्य नीति की प्राथमिकता होनी चाहिए।


