Women Representatives: जनप्रतिनिधि होने का पहला अर्थ ही जनता के बीच उपलब्ध रहना है। सड़क, नाली, सफाई, पानी और स्ट्रीट लाइट जैसी समस्याएं बाद की बात हैं; लोकतंत्र की पहली शर्त संवाद है। लेकिन स्थानीय निकायों में महिला जनप्रतिनिधियों को लेकर सामने आती शिकायतें इस बुनियादी सवाल को कठघरे में खड़ा करती हैं कि आखिर जनता अपने प्रतिनिधि तक पहुंचे तो कैसे?
कई जगहों से ऐसी शिकायतें सामने आती रही हैं कि महिला पार्षदों और अन्य स्थानीय निकाय प्रतिनिधियों के फोन या तो बंद मिलते हैं, कॉल का जवाब नहीं मिलता या फोन उठाने की जिम्मेदारी पति, बेटे, भाई अथवा निजी सहायक संभालते हैं। यह व्यवस्था सुविधाजनक भले हो, लेकिन इससे जनप्रतिनिधि और जनता के बीच सीधे संवाद की वह कड़ी कमजोर होती है, जिसे लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियाद माना जाता है।
महिला आरक्षण का उद्देश्य केवल सदनों में महिलाओं की संख्या बढ़ाना नहीं है। इसका बड़ा मकसद महिलाओं को निर्णय प्रक्रिया में प्रत्यक्ष और प्रभावी भागीदारी देना है। ऐसे में यदि निर्वाचित प्रतिनिधि की जगह परिवार का सदस्य फोन संभाले या जनता को अपनी समस्या बताने के लिए किसी दूसरे व्यक्ति का सहारा लेना पड़े, तो सवाल केवल एक फोन कॉल का नहीं रह जाता। सवाल यह है कि निर्वाचित पद की वास्तविक जिम्मेदारी कौन निभा रहा है?
बैठकों में भी कई बार महिला जनप्रतिनिधियों के साथ उनके पति, बेटे या अन्य परिजन मौजूद रहते हैं। परिवार का साथ होना अपने आप में आपत्तिजनक नहीं है, लेकिन जब निर्वाचित प्रतिनिधि की जगह परिजन ही चर्चा, जवाब या निर्णय की भूमिका में दिखाई देने लगें, तो इससे कई बार अप्रिय और असहज स्थितियां पैदा होती हैं। इससे न केवल महिला जनप्रतिनिधि की स्वतंत्र भूमिका पर सवाल उठते हैं, बल्कि यह भी स्पष्ट नहीं रहता कि जनता के प्रति वास्तविक जवाबदेही किसकी है।
बेशक, परिवार का सहयोग लेना कोई असामान्य बात नहीं। हर जनप्रतिनिधि को सहयोगियों और कर्मचारियों की जरूरत होती है। लेकिन सहयोग और प्रतिनिधि की भूमिका अपने हाथ में लेने के बीच एक स्पष्ट अंतर है। जनता ने प्रतिनिधि चुना है, उसके प्रतिनिधि को नहीं।
लोकतंत्र में फोन उठाना कोई संवैधानिक बाध्यता नहीं, लेकिन जनता के प्रति जवाबदेही जरूर जनप्रतिनिधित्व की मूल भावना है। स्थानीय निकायों को प्रतिनिधियों के संपर्क नंबर नियमित रूप से अपडेट करने, शिकायतों की निगरानी और नागरिकों से सीधे संवाद की व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए।
आरक्षण से प्रतिनिधित्व का दरवाजा खुला है; अब जरूरत इस बात की है कि उस प्रतिनिधित्व में स्वतंत्रता, सक्रियता और जवाबदेही भी दिखाई दे।


