More
    Homeसंपादकीयपानी-सीवर लाइनों की रोबोट निगरानी: सिस्टम की नाकामी पर पर्दा डालने का...

    पानी-सीवर लाइनों की रोबोट निगरानी: सिस्टम की नाकामी पर पर्दा डालने का नया खर्च?

    Published on

    spot_img

    Water Sewer System: इंदौर के भागीरथपुरा की त्रासदी ने मध्यप्रदेश की पानी और सीवर व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। दूषित पानी से हुई मौतों ने यह सोचने को मजबूर किया है कि आखिर जिस व्यवस्था पर हर महीने करोड़ों रुपये वेतन और रखरखाव के नाम पर खर्च होते हैं, वह पाइपलाइनों की स्थिति पर नजर क्यों नहीं रख सकी?

    अब सरकार पानी और सीवर लाइनों की निगरानी के लिए रोबोटिक सिस्टम का सहारा लेने जा रही है। तकनीक के अपने फायदे हैं। रोबोट पाइपलाइन के भीतर जाकर उन हिस्सों की तस्वीर और स्थिति सामने ला सकता है, जहां इंसान के लिए सीधे पहुंचना मुश्किल है। लीकेज, टूट-फूट, जाम और दूसरी तकनीकी खामियों की पहचान में यह व्यवस्था उपयोगी साबित हो सकती है।

    लेकिन सवाल यह है कि क्या रोबोट सरकारी सिस्टम की नाकामी का इलाज है या उस नाकामी पर पर्दा डालने का नया खर्च?

    सरकार के पास पहले से इंजीनियर हैं, तकनीकी कर्मचारी हैं, निरीक्षण अमला है, शिकायतों की व्यवस्था है और पाइपलाइन के रखरखाव के लिए अलग तंत्र है। फिर भागीरथपुरा जैसी स्थिति बनने से पहले खतरे के संकेत क्यों नहीं पकड़े गए? पुरानी पाइपलाइन की स्थिति की नियमित निगरानी क्यों नहीं हुई? सीवर और पेयजल लाइन के बीच संभावित रिसाव या मिलावट का पता समय रहते क्यों नहीं चला?

    इन सवालों का जवाब दिए बिना केवल रोबोट खरीदना या किराये पर लेना समस्या का स्थायी समाधान कैसे माना जा सकता है?

    सबसे महत्वपूर्ण सवाल मानव संसाधन और जवाबदेही का है। जब रोबोट पाइपलाइन की निगरानी करेगा तो पहले से इस काम के लिए तैनात अधिकारी और कर्मचारी क्या करेंगे? क्या उनकी जिम्मेदारियां बदली जाएंगी? क्या निरीक्षण अमला कम होगा? या रोबोट के साथ-साथ वही पूरा तंत्र भी चलता रहेगा और सरकार पर दोहरा खर्च आएगा?

    और मान लीजिए रोबोट ने किसी पाइपलाइन में गंभीर खामी पकड़ ली। उसके बाद मरम्मत में देरी हुई और कोई हादसा हो गया, तो जिम्मेदार कौन होगा-रोबोट, ठेकेदार, कर्मचारी या अधिकारी?

    जनता के पैसे से चलने वाली किसी भी नई व्यवस्था का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि वह आधुनिक है। सवाल यह होना चाहिए कि क्या इससे जवाबदेही बढ़ेगी, खर्च कम होगा और हादसे रोकने की क्षमता वास्तव में मजबूत होगी?

    भागीरथपुरा के बाद सरकार को रोबोट के साथ-साथ अपने मौजूदा सिस्टम का भी ऑडिट करना चाहिए। कितनी पाइपलाइनें कब जांची गईं, कितनी खराब मिलीं, कितनी बदली गईं और किस अधिकारी ने उस निरीक्षण की जिम्मेदारी निभाई-इन सबका सार्वजनिक हिसाब होना चाहिए।

    रोबोट खामी खोज सकता है, लेकिन व्यवस्था की नाकामी की जिम्मेदारी तय नहीं कर सकता। अगर पुराना सिस्टम जवाबदेह नहीं बनाया गया तो नई तकनीक कहीं जनता के पैसे से खड़ी की गई एक और परत बनकर न रह जाए।

    Latest articles

    एमपी में 5 आईएएस अधिकारियों के तबादले, सागर-देवास-सिवनी को मिले नए कलेक्टर

    भोपाल। मध्य प्रदेश सरकार ने प्रशासनिक फेरबदल करते हुए पांच आईएएस अधिकारियों के तबादले...

    MP पुलिस में बड़ा फेरबदल: बालाघाट एसपी आदित्य मिश्रा सहित चार आईपीएस अधिकारियों की नई पदस्थापना

    भोपाल ।  मध्य प्रदेश सरकार ने पुलिस विभाग में प्रशासनिक फेरबदल करते हुए चार...

    MP Cabinet Decisions: नर्मदा घाटी की योजनाओं के लिए ₹3378 करोड़, EOW को 345 करोड़ रुपए

    भोपाल। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता में मंगलवार को हुई मध्य प्रदेश कैबिनेट...

    एमपी में वाणिज्यिक कर अधिकारी के ठिकानों पर लोकायुक्त का छापा, आय 1 करोड़ तो खर्च 3.78 करोड़

    भोपाल। मध्य प्रदेश में आय से अधिक संपत्ति के मामले में लोकायुक्त ने वाणिज्यिक...

    More like this

    एमपी में 5 आईएएस अधिकारियों के तबादले, सागर-देवास-सिवनी को मिले नए कलेक्टर

    भोपाल। मध्य प्रदेश सरकार ने प्रशासनिक फेरबदल करते हुए पांच आईएएस अधिकारियों के तबादले...

    MP पुलिस में बड़ा फेरबदल: बालाघाट एसपी आदित्य मिश्रा सहित चार आईपीएस अधिकारियों की नई पदस्थापना

    भोपाल ।  मध्य प्रदेश सरकार ने पुलिस विभाग में प्रशासनिक फेरबदल करते हुए चार...

    MP Cabinet Decisions: नर्मदा घाटी की योजनाओं के लिए ₹3378 करोड़, EOW को 345 करोड़ रुपए

    भोपाल। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता में मंगलवार को हुई मध्य प्रदेश कैबिनेट...