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    शिक्षक राजनीति में उतरें तो शिक्षा व्यवस्था का क्या होगा?

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    MP Guest Faculty:लोकतंत्र में चुनाव लड़ना हर नागरिक का अधिकार है, लेकिन जब यह बात सत्ता में बैठे किसी मंत्री और अपनी नौकरी की सुरक्षा के लिए संघर्ष कर रहे शिक्षकों के बीच संवाद का हिस्सा बने, तो उसके अर्थ केवल राजनीतिक नहीं रह जाते। मध्यप्रदेश में अतिथि विद्वानों के आंदोलन ने इसी सवाल को जन्म दिया है।

    अतिथि विद्वान लंबे समय से नियमितीकरण, नौकरी की स्थिरता और ‘फॉलन आउट’ प्रक्रिया रोकने की मांग कर रहे हैं। इस व्यवस्था में नियमित प्राध्यापक की नियुक्ति या स्थानांतरण होने पर संबंधित कॉलेज में कार्यरत अतिथि विद्वान की सेवा प्रभावित हो सकती है। हाल में करीब 200 अतिथि विद्वानों ने उच्च शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार के भोपाल स्थित आवास के बाहर प्रदर्शन किया था। प्रतिनिधिमंडल और मंत्री के बीच बातचीत के बाद अतिथि विद्वानों ने आरोप लगाया कि उन्हें चुनाव लड़ने की चुनौती दी गई।

    यहीं से सवाल बड़ा हो जाता है। क्या किसी शिक्षक की रोजगार संबंधी शिकायत का उत्तर चुनाव लड़ने की चुनौती हो सकता है? लोकतंत्र में असहमति का जवाब राजनीतिक मैदान सुझाना नहीं, बल्कि नीति और तर्क के स्तर पर दिया जाना चाहिए। यदि शिक्षकों की मांग उचित नहीं है तो सरकार उसके कारण स्पष्ट करे; यदि उचित है तो समाधान का रास्ता बताए।

    दूसरी ओर अतिथि विद्वानों का ‘विद्वान जनता पार्टी’ बनाकर चुनाव में उतरने का फैसला भी लोकतांत्रिक अधिकार के दायरे में है। लेकिन शिक्षक यदि बड़ी संख्या में राजनीतिक संघर्ष को ही अपनी समस्याओं के समाधान का माध्यम मानने लगें, तो यह शिक्षा व्यवस्था के लिए भी गंभीर सवाल खड़े करेगा। कक्षा, शोध और विद्यार्थियों की जिम्मेदारी से राजनीति की सक्रिय भूमिका को कैसे अलग रखा जाएगा, यह स्पष्ट होना जरूरी है।

    लोकतंत्र में शिक्षक का राजनीतिक अधिकार उतना ही महत्वपूर्ण है जितना किसी अन्य नागरिक का। मगर सरकार और शिक्षकों-दोनों की पहली जिम्मेदारी शिक्षा की गुणवत्ता और विद्यार्थियों का भविष्य है। इसलिए इस पूरे विवाद का समाधान चुनावी चुनौती में नहीं, स्पष्ट नीति, पारदर्शी संवाद और समयबद्ध निर्णय में तलाशा जाना चाहिए।

    शिक्षक राजनीति में जाएं या न जाएं, यह उनका व्यक्तिगत निर्णय है। लेकिन ऐसी स्थिति पैदा न हो जिसमें नौकरी और भविष्य की चिंता से जूझ रहे शिक्षक को अपनी समस्या के समाधान के लिए कक्षा छोड़कर चुनाव का रास्ता चुनना पड़े—यही लोकतांत्रिक व्यवस्था और शिक्षा, दोनों के लिए अधिक महत्वपूर्ण सवाल है।

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