नरोत्तम का टिकट काटने की कीमत या रणनीतिक भूल?
-महेश दीक्षित
भोपाल। दतिया विधानसभा उपचुनाव का नतीजा केवल एक सीट की हार-जीत नहीं है, बल्कि यह मप्र भाजपा की राजनीतिक रणनीति और नेतृत्व के फैसलों पर गंभीर सवाल खड़े करता है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर इस हार का आरोपी कौन है?
कांग्रेस प्रत्याशी घनश्याम सिंह ने भाजपा के आशुतोष तिवारी को 6,056 मतों के बड़े अंतर से पराजित कर दिया। दतिया की हार भाजपा के लिए लगातार दूसरा बड़ा झटका है। 2023 के विधानसभा चुनाव में भी पार्टी दतिया सीट नहीं बचा सकी थी और अब उपचुनाव में भी वापसी का मौका गंवा बैठी। सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह रहा कि पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा का अपना मतदान केंद्र भी कांग्रेस के पक्ष में चला गया।
यह उपचुनाव पूर्व कांग्रेस विधायक राजेंद्र भारती की बैंक धोखाधड़ी के एक मामले में सजा होने के बाद रिक्त हुई सीट पर हुआ था। सामान्य परिस्थितियों में सत्ता पक्ष ऐसी सीटों पर बढ़त हासिल करने की कोशिश करता है, लेकिन भाजपा इस अवसर को भी राजनीतिक जीत में नहीं बदल सकी।
इस हार का सबसे बड़ा कारण उम्मीदवार चयन माना जाएगा। भाजपा ने प्रदेश के सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिने जाने वाले डॉ. नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटकर नए चेहरे आशुतोष तिवारी को मैदान में उतारा। इसे नई पीढ़ी को आगे लाने और संगठन में बदलाव का संदेश बताया गया, लेकिन जनता ने इस प्रयोग को स्वीकार नहीं किया।
भाजपा के भीतर लंबे समय से कुछ प्रभावशाली नेताओं को किनारे कर नए नेतृत्व को स्थापित करने की चर्चा रही है। दतिया उस रणनीति की पहली बड़ी परीक्षा या कहो प्रयोग था और परिणाम ने बता दिया कि राजनीतिक प्रयोग केवल संगठनात्मक गणित से सफल नहीं होते। जिन नेताओं ने वर्षों की मेहनत से किसी क्षेत्र को भाजपा का मजबूत गढ़ बनाया हो, उन्हें एक झटके में अप्रासंगिक मान लेना चुनावी दृष्टि से भारी पड़ सकता है।
अब सवाल भाजपा के भीतर ही उठेगा। क्या इस हार का जिम्मेदार वह नेतृत्व है जिसने नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटवाया? या वे रणनीतिकार जिन्होंने शीर्ष नेतृत्व को यह भरोसा दिलाया कि दतिया में चेहरा बदलने से कोई नुकसान नहीं होगा? यदि निर्णय सामूहिक था, तो जवाबदेही भी सामूहिक होनी चाहिए।
दतिया का जनादेश एक और संदेश देता है कि, मप्र की राजनीति में अभी भी जनाधार रखने वाले नेताओं की उपयोगिता समाप्त नहीं हुई है। संगठन महत्वपूर्ण है, लेकिन संगठन जनता के विश्वास का विकल्प नहीं बन सकता। चुनाव कार्यकर्ता लड़ते हैं, पर जीत अक्सर स्थानीय नेतृत्व की स्वीकार्यता तय करती है।
इस परिणाम ने कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष जीतू पटवारी को भी बड़ी राजनीतिक राहत दी है। अपनी ही पार्टी में नेतृत्व को लेकर उठते सवालों के बीच दतिया की जीत ने उनके नेतृत्व की साख को मजबूती दी है।
भाजपा के लिए अब सबसे बड़ा सवाल समीक्षा का नहीं, आत्ममंथन का है। क्या पार्टी इस हार को सामान्य चुनावी उतार-चढ़ाव मानकर आगे बढ़ जाएगी, या यह स्वीकार करेगी कि दतिया में विपक्ष से अधिक नुकसान उसे अपनी रणनीति ने पहुंचाया?
दतिया ने एक बार फिर साबित कर दिया कि राजनीति में संगठन और सत्ता महत्वपूर्ण हैं, लेकिन जनता के बीच वर्षों में अर्जित विश्वास और जनाधार की अनदेखी का मूल्य अक्सर चुनाव परिणामों के रूप में चुकाना पड़ता है। अब देखना यह है कि भाजपा इस संदेश को सुनती है या अगला प्रयोग किसी और राजनीतिक गढ़ में दोहराती है।


