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    सिंधु जल संधि पर पाकिस्तान की गीदड़ भभकी

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    भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि केवल जल बंटवारे का समझौता नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया में स्थिरता और संवाद का एक महत्वपूर्ण आधार रही है। छह दशक से अधिक समय तक यह संधि युद्ध, राजनीतिक तनाव और सीमा विवादों के बावजूद कायम रही। लेकिन हाल के घटनाक्रमों ने इस ऐतिहासिक समझौते को भी विवाद के केंद्र में ला खड़ा किया है।

    पाकिस्तान के नेताओं की ओर से हाल में दिए गए आक्रामक और धमकी भरे बयान यह संकेत देते हैं कि जल जैसे गंभीर और मानवीय विषय को भी राजनीतिक बयानबाजी का माध्यम बनाया जा रहा है। किसी भी जिम्मेदार राष्ट्र से अपेक्षा होती है कि वह ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर संयमित और संतुलित भाषा का प्रयोग करे। धमकियां न तो कूटनीति का विकल्प हो सकती हैं और न ही वे किसी विवाद का स्थायी समाधान देती हैं।

    भारत ने पहलगाम आतंकी हमले के बाद स्पष्ट किया कि आतंकवाद और सामान्य द्विपक्षीय संबंध साथ-साथ नहीं चल सकते। इसी संदर्भ में सिंधु जल संधि को लेकर भारत ने अपना रुख सख्त किया। दूसरी ओर पाकिस्तान का तर्क है कि यह संधि अंतरराष्ट्रीय दायित्वों के तहत संरक्षित है और इसे एकतरफा बदला नहीं जा सकता। ऐसे में यह विवाद केवल दो देशों के बीच राजनीतिक मतभेद का विषय नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय कानून, सुरक्षा और कूटनीतिक प्रक्रियाओं से भी जुड़ा हुआ है।

    यह भी ध्यान रखना होगा कि दक्षिण एशिया पहले से ही जलवायु परिवर्तन, घटते जल संसाधनों और बढ़ती आबादी जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है। ऐसे समय में जल को टकराव का हथियार बनाने की बजाय सहयोग, वैज्ञानिक प्रबंधन और संवाद का माध्यम बनाया जाना चाहिए। जल संकट का प्रभाव सीमाओं से परे जाकर करोड़ों लोगों की आजीविका, खाद्य सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता पर पड़ता है।

    इतिहास बताता है कि उग्र बयानबाजी से सुर्खियां तो मिल सकती हैं, लेकिन समाधान नहीं। स्थायी रास्ता हमेशा बातचीत, पारदर्शिता और आपसी विश्वास से निकलता है। यदि क्षेत्र में शांति और विकास को प्राथमिकता देनी है, तो दोनों देशों को भावनात्मक प्रतिक्रियाओं के बजाय जिम्मेदार कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय नियमों के दायरे में रहकर आगे बढ़ना होगा। जल जीवन का आधार है, इसे राजनीतिक टकराव का स्थायी हथियार बनाना किसी भी पक्ष के दीर्घकालिक हित में नहीं माना जा सकता।

    #IndusWatersTreaty #IndiaPakistan #WaterDiplomacy #Geopolitics #Editorial

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