-महेश दीक्षित
Politicians crossing the ‘Lakshman Rekha’ of propriety: कुर्सी और सत्ता की लड़ाई में शब्दों का स्तर इतना गिर जाए कि नेताओं को अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी के दिवंगत माता-पिता तक को निशाना बनाने में संकोच न हो, तो यह सिर्फ भाषाई या शाब्दिक गिरावट नहीं, राजनीति के पुरोधाओं के चरित्र और संस्कारों पर भी गंभीर सवाल है। राजनीति में विरोध कीजिए, नीतियों पर प्रहार कीजिए, आरोपों का जवाब दीजिए, लेकिन किसी के परिवार और दिवंगत परिजनों को विवाद में घसीटकर आखिर कौन-सी राजनीतिक श्रेष्ठता सिद्ध की जा रही है?
पटना में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के बयान पर उठा विवाद इसी सवाल को सामने लाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दिवंगत पिता को लेकर की गई टिप्पणी पर भाजपा ने कड़ी आपत्ति जताते हुए बिना शर्त माफी की मांग की है। कांग्रेस ने बयान का संदर्भ सामने रखकर अपना पक्ष रखा है। लेकिन दलों की सफाई और आरोप-प्रत्यारोप के बीच मूल प्रश्न कहीं अधिक गंभीर है-क्या राजनीतिक विरोध की भी कोई मर्यादा शेष है?
प्रधानमंत्री के दिवंगत पिता पर टिप्पणी केवल एक परिवार के सम्मान का प्रश्न नहीं, भारतीय संस्कृति, पारिवारिक संस्कारों और सामाजिक मर्यादाओं से जुड़ा विषय भी है। जिस देश की परंपरा माता-पिता के प्रति आदर और दिवंगत आत्मा के प्रति सम्मान सिखाती है, वहां राजनीतिक मंचों से ऐसी भाषा का इस्तेमाल चिंताजनक है। लोकतंत्र नेताओं को आलोचना का अधिकार देता है, किसी की पारिवारिक गरिमा को रौंदने का विशेषाधिकार नहीं।
विडंबना देखिए कि जनता के सामने आदर्शों, संस्कारों और नैतिकता की दुहाई देने वाले राजनीतिक दलों के मंचों पर ही कई बार भाषा संयम खो देती है। नेताओं को लगता है कि तीखी टिप्पणी से तालियां मिलेंगी, सुर्खियां बनेंगी और समर्थकों में उत्साह बढ़ेगा। लेकिन तालियों के शोर में यह तथ्य अनदेखा कर दिया जाता है कि हर अपमानजनक टिप्पणी सार्वजनिक संवाद को थोड़ा और विषाक्त बनाती है। जब नेतृत्व ही शब्दों की सीमा तोडऩे लगे, तो समाज से संयम की अपेक्षा कैसे की जा सकती है? यह सवाल केवल खरगे या कांग्रेस का नहीं है। भाजपा सहित सभी राजनीतिक दलों को एक ही कसौटी पर परखा जाना चाहिए। अपने नेता की अनुचित टिप्पणी को संदर्भ के नाम पर उचित ठहराना और विरोधी की चूक पर राजनीतिक लाभ उठाना, दोनों दोहरे मापदंड हैं। राजनीतिक शुचिता की शुरुआत अपने पक्ष के आचरण की निष्पक्ष समीक्षा से ही होती है।
राजनीति में असहमति लोकतंत्र की ताकत है, लेकिन व्यक्तिगत अपमान उसकी ताकत नहीं, कमजोरी है। नेताओं को तय करना होगा कि वे जनता के सामने विचारों की लड़ाई लडऩा चाहते हैं या कटुता की संस्कृति को बढ़ावा देना चाहते हैं। मर्यादा की लक्ष्मण रेखा लांघकर कुछ पल की वाहवाही तो मिल सकती है, लेकिन उससे लोकतांत्रिक गरिमा और सामाजिक संस्कारों को होने वाली क्षति की भरपाई आसान नहीं। राजनीति में शब्दों की धार नीतियों और तर्कों पर चलनी चाहिए, किसी के माता-पिता या परिजनों के सम्मान पर नहीं।


